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अक्टूबर 20, 2023
Evangelize अक्टूबर 20, 2023

“मैं एक कैथलिक हूं और मैं ख़ुशी ख़ुशी परमेश्वर के लिए मर जाऊंगा। अगर मेरे पास एक हजार जीवन होते, तो मैं वे एक हज़ार जीवन परमेश्वर को अर्पित कर देता।“

ये उस आदमी के मरते हुए शब्द थे जिस को यह निर्णय लेने का अवसर दिया गया था कि उसे जीना है या मरना है।

लोरेंजो रुइज़ का जन्म 1594 में मनीला में हुआ था। उनके चीनी पिता और फिलिपिनो माँ दोनों कैथलिक थे। बचपन में उसे डोमिनिकन फादर लोगों ने शिक्षा दी, उसने वेदी सेवक और गिरजाघर- परिचर के रूप में सेवा की, और अंततः एक पेशेवर सुलेखक (कैलीग्राफेर) बन गया। लोरेंजो अति पवित्र रोज़री माला संघ के एक सदस्य थे, उन्होंने रोसारियो के साथ शादी की और उन दोनों के दो बेटे थे।

सन १636 में उनके जीवन में एक दुखद मोड़ आया। उन पर हत्या का झूठा आरोप लगाया गया। उन्होंने तीन डोमिनिकन पादरियों की मदद मांगी, जो जापान के लिए एक मिशनरी यात्रा करने वाले थे, जबकि उन दिनों जापान में ईसाइयों पर क्रूर उत्पीड़न का दौर चल रहा था। लोरेंजो को जापान की और यात्रा का तब तक कोई अंदाजा नहीं था। नाव जापान की ओर रवाना होने के बाद ही लोरेंजों को उसके और उसके समूह की यात्रा का मंजिल और वहां के खतरे के बारे में पता चला।

जापानियों को डर था कि ​​​​स्पेन ने जिस तरह फिलीपींस पर आक्रमण किया था, उसी तरह जापान पर भी आक्रमण करने केलिए धर्म का उपयोग किया जाएगा, इसलिए जापान ने ईसाई धर्म का जमकर विरोध किया। मिशनरियों को जल्द ही ढूंढा गया, कैद किया गया, और कई क्रूर यातनाओं के अधीन किया गया। उत्पीडन का एक यह भी तरीका था कि मिशनरियों के गले में भारी मात्रा में पानी डाला जाता, फिर सैनिक बारी-बारी से मिशनरियों के पेट पर रखे बोर्ड के आर-पार खड़े हो जाते, जिससे उनके मुंह, नाक और आंखों से पानी तेजी से बहता।

अंत में, उन्हें एक गड्ढे के ऊपर उल्टा लटका दिया गया, उनके शरीर को कसकर बांधे गए, जिससे उनके शरीर में रक्त का धीमी गति से परिसंचरण होता था, लंबे समय तक दर्द और धीमी गति से मृत्यु होती थी। लेकिन पीड़ित का एक हाथ हमेशा खुला छोड़ दिया जाता था, ताकि वह पीछे हटने के अपने इरादे का संकेत दे सके। न तो लोरेंजो और न ही उनके साथी पीछे हटे। वास्तव में, जब उसके उत्पीड़कों ने उससे पूछताछ की और जान से मारने की धमकी दी, तो उसका विश्वास और मजबूत हो गया। ये पवित्र शहीद तीन दिनों तक गड्ढे के ऊपर लटके रहे। तब तक, लोरेंजो मर चुका था और जो तीन पुरोहित अभी भी जीवित थे, उनके सिर काट दिए गए थे।

उनके विश्वास का एक त्वरित त्याग उनके जीवन को बचा सकता था। इसके बजाय, उन्होंने शहीद का मुकुट पहनकर मरना चुना। उनकी वीरता हमें साहस के साथ और बिना समझौता किए अपने विश्वास को जीने के लिए प्रेरित करे।

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By: Shalom Tidings

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जून 03, 2023
Evangelize जून 03, 2023

पिछले हफ्ते, मैंने अपने धर्मप्रन्त के प्रांतीय प्रभारियों से कई मुद्दों पर चर्चा करने के लिए मुलाकात की। कुछ पल्लियों का विलय करने और उन्हें अन्य समूहों के साथ पुनर्गठित करने की प्रक्रिया चल रही थी, और यही चर्चा का प्रमुख विषय रहा। पिछले कई वर्षों से ये कदम उठाए जा रहे हैं, कई कारणों की वजह से ज़रूरी थे, जैसे: पुरोहितों की घटती संख्या, हमारे शहरों और कस्बों में जनसांख्यिकीय बदलाव, आर्थिक दबाव, आदि। मैंने इनमें से कुछ बदलाव के लिए अपना अनुमोदन व्यक्त किया और अपने प्रांतीय प्रभारियों से कहा कि मुझे समेकन की प्रत्येक रणनीति के साथ साथ विकास के लिए भी एक रणनीति चाहिए।

मैं बस इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इंकार करता हूं कि मुझे या किसी अन्य धर्माध्यक्ष को हमारी देखरेख या अध्यक्षता में गिरजाघरों को बंद करने की प्रक्रिया लेनी चाहिए। ईसाई धर्म, अपने स्वभाव से ही, अपकेंद्रित, बाहरी-प्रवृत्ति वाला, उद्देश्य और दायरे में सार्वभौमिक है। येशु ने यह नहीं कहा, “अपने मुट्ठी भर दोस्तों को सुसमाचार सुनाओ,” या “अपनी ही संस्कृति के लोगों के लिए सुसमाचार की घोषणा करो।” इसके बजाय, येशु ने अपने चेलों से कहा: “मुझे स्वर्ग में और पृथ्वी पर सारा अधिकार मिला है। इसलिये तुम लोग जाकर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ, और उन्हें पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से बपतिस्मा दो” (मत्ती 28:18-19)। उन्होंने अपने अनुयायियों को यह भी निर्देश दिया कि उनके द्वारा स्थापित की गयी कलीसिया के खिलाफ नरक के द्वार प्रबल नहीं होंगे। इसलिए, येशु हमसे यह अपेक्षा नहीं करते हैं कि हम सिर्फ पूर्वस्थिति बनाए रखें, या पतन का प्रबंधन करें, या डूबते पानी में ही बने रहें।

मुझे यह कहने की अनुमति दें कि हमारी कलीसिया की प्रगति के कार्य की ज़िम्मेदारी किसी भी तरह से धर्माध्यक्षों और पुरोहितों तक सीमित नहीं है। जैसा कि द्वितीय वेटिकन अधिवेशन स्पष्ट रूप से सिखाता है, प्रत्येक बपतिस्मा प्राप्त कैथलिक को सुसमाचार का प्रचारक बनने के लिए नियुक्त किया गया है; इसलिए हम सब को इसमें एक साथ कार्य करना हैं। इसलिए सोचना होगा कि विकास की कुछ रणनीतियाँ क्या हैं जो कोई भी कैथलिक काम में ला सकता है? पहली बात जिसे मैं उजागर करना चाहूँगा, वह है: प्रत्येक परिवार जो नियमित रूप से मिस्सा-बलिदान में भाग लेता है उसे इस आने वाले वर्ष में एक और परिवार को मिस्सा-बलिदान में लाने का अपना सुसमाचारीय उत्तरदायित्व निभाना चाहिए। इन शब्दों को पढ़ने वाला प्रत्येक विश्वासी उन लोगों को जानता है जिन्हें मिस्सा में जाना चाहिए और जिसे नहीं। वे आपके अपने बच्चे या नाती-पोते हो सकते हैं। वे सहकर्मी हो सकते हैं जो कभी उत्साही कैथलिक थे और जो केवल विश्वास के अभ्यास से दूर चले गए, या शायद वे लोग जो कलीसिया से नाराज हैं। इन भटकती हुई भेड़ों की पहचान करें और उन्हें मिस्सा-पूजा में वापस लाने के लिए उसे अपनी सुसमाचारीय चुनौती बनाएं। यदि हम सभी ने इस कार्य को सफलतापूर्वक किया, तो हम एक ही वर्ष में अपनी पल्लियों के आकार को दोगुना कर सकेंगे।

दूसरी सिफारिश कलीसिया की प्रगति के लिए प्रार्थना करना है। पवित्र शास्त्रों के अनुसार, प्रार्थना के बिना कोई भी महान कार्य कभी पूरा नहीं हो सकता। इसलिए दृढ़ता से, यहाँ तक कि हठपूर्वक, प्रभु से विनती करें कि वह अपनी बिखरी हुई भेड़ों को वापस लावे। जिस तरह हमें फसल के मालिक से उसकी फसल काटने के लिए मजदूरों को भेजने की विनती करनी पड़ती है, उसी तरह हमें उस मालिक से उनकी भेड़-बकरियों की संख्या बढ़ाने के लिए भीख माँगनी पड़ती है। मैं इस विशिष्ट कार्य को करने के लिए पल्ली के बुजुर्गों और घर में रहने वालों से आग्रह करना चाहता हूँ। और मैं उन लोगों से विनती करता हूँ जो नियमित रूप से यूखरिस्त की आराधना करते हैं कि वे प्रतिदिन पंद्रह या तीस मिनट प्रभु से इस विशेष कृपा के लिए प्रार्थना करें। या मैं सुझाव दूंगा कि पूजा-विधि की योजना बनानेवाले रविवारीय मिस्सा में विश्वासियों की प्रार्थनाओं में पल्ली की प्रगति और विस्तार के लिए भी प्रार्थनाएँ शामिल करें।

तीसरी बात साधकों को प्रश्न पूछने के लिए आमंत्रित करना है। मैं पिछले बीस वर्षों में बहुत सारे ठोस अनुभवों से जानता हूँ कि कई युवा लोग, यहाँ तक कि वे जो विश्वास के प्रति शत्रुता का दावा करते हैं, वास्तव में धर्म में गहरी रुचि रखते हैं। जैसे हेरोद जेल में योहन बपतिस्ता के उपदेश को सुनता है, वैसे ही धर्म-विरोधी भी धार्मिक वेबसाइटों पर जाकर कलीसिया के बारे में ध्यान से जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। तो उन लोगों से पूछिए जो कलीसिया से दूर हैं कि वे अब मिस्सा में क्यों नहीं आते। वे आपको कारण बताने में उनका उत्साह देखकर आपको आश्चर्य होगा। फिर आपको संत पेत्रुस की सिफारिश का पालन करना होगा: “जो लोग आपकी आशा के आधार के विषय में आप से प्रश्न करते हैं, उन्हें विनम्रता तथा आदर के साथ उत्तर देने के लिए सदा तैयार रहें” (1 पेत्रुस 3:15)। दूसरे शब्दों में, यदि आप प्रश्नों की मांग करते हैं, तो बेहतर होगा कि आप कुछ उत्तर देने के लिए तैयार रहें। इसका मतलब है कि आपको अपने ईशशास्त्र, अपना पक्षमंडनशास्त्र (अपने पक्ष की सफाई), अपना पवित्र शास्त्र, अपना दर्शनशास्त्र और अपना कलीसियाई इतिहास को मजबूत करना होगा। यदि यह कठिन लगता है, तो याद रखें कि पिछले पच्चीस वर्षों में इन सारे सवालों के इर्द गिर्द इतने सारे साहित्य उपलब्ध हुए हैं; जो प्रश्न अक्सर युवा साधक पूछते हैं, ठीक उसी प्रकार के प्रश्नों पर ध्यान केंद्रित कीजिये – और इसमें से अधिकांश आसानी से आप ऑनलाइन प्राप्त कर सकते हैं। .

एक चौथा और अंतिम सुझाव जो मैं दूंगा; वह बस इतना है: दयालु बनें। शेरी वाडेल, जिनकी रचना “फॉर्मिंग इन्टेंशनल डीसाइपल्स” (ज्ञानकृत शिष्यों का प्रशिक्षण) सुसमाचार-प्रचार के क्षेत्र में एक आधुनिक क्लासिक बन गया है। उनका कहना है कि किसी को विश्वास में लाने के लिए एक महत्वपूर्ण पहला कदम भरोसा बढ़ाना है। यदि कोई सोचता है कि आप एक अच्छे और सभ्य व्यक्ति हैं, तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि आपको अपने विश्वास के बारे में बोलते वक्त वह सुनेगा। सच बोलूँ तो हमारी कैथलिक सोशल-मीडिया पर सबसे आकस्मिक नज़र भी अप्रिय व्यवहार की अधिकता को प्रकट करती है। बहुत से लोग ‘हम बिकुल सही हैं’ ऐसा ढिंढोरा पीटने के इरादे से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, ऐसे सूक्ष्म या संकुचित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं जो अधिकांश लोगों के लिए अबोधगम्य और अप्रासंगिक हैं। उनका इरादा बस अपने दुश्मनों को केवल चीर फाड़कर हराना हैं। मुझे डर है कि जो कलीसिया ‘डिजिटल स्पेस’ के बाहर है, उसके प्रति लोगों का दृष्टिकोण बढ़ा चढ़ाकर सोशल-मिडिया में दिखती है। ये मनोवृत्तियाँ सुसमाचार-प्रचार के प्रतिकूल हैं। मेरे एक सहयोगी ने कहा कि कलीसिया से अलग और दूर हुए लोगों के साथ उनकी बातचीत में उन्हें पता चला कि जो चीज़ उन्हें कलीसिया से दूर रखती है, वह विश्वासियों की नीचता और निकृष्टता है। इसलिए ऑनलाइन और वास्तविक जीवन दोनों में दयालु बनें। स्पष्ट रूप से कटु और दुखी लोगों के विश्वास के जीवन के बारे में सुनने में किसी को भी दिलचस्पी नहीं होगी।

इसलिए, हमारे पास हमें आगे बढ़ने के आदेश हैं: सभी राष्ट्रों में प्रभु येशु मसीह की घोषणा करें। आइए हम अपने पल्लियों, अपने परिवारों से शुरुआत करें। और हम यथास्थिति बनाए रखने की बात कभी न सोचें।

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By: बिशप रॉबर्ट बैरन

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जून 03, 2023
Evangelize जून 03, 2023

ईश्वर को आपके जीवन में एक सुंदर कहानी लिखने दें

वह गर्मियों का एक खूबसूरत दिन था जब हम आराम से दोस्तों के साथ बातें कर रहे थे जबकि बच्चे क्रीक में हँसते हुए खेल रहे थे। मेरे दोस्तों ने बड़े गर्व से हमें अपने बड़े बेटे के बारे में बताया जो दंत चिकित्सा में अपना करियर बनाने के लिए मैक्सिको गया था, क्योंकि मैक्सिको में पढ़ाई यहाँ से कहीं अधिक किफायती था। उनके बेटे ने उन्हें अपने नए दोस्त बनाने के बारे में बताया था। वह जिन लड़कियों से मिला, उनमें से एक ने अपने व्यवहार और रवैये से उस लड़के को चकित कर दिया। उस लडकी का व्यवहार मेरे मित्र के बेटे के रूढ़िवादी मूल्यों से बिलकुल मेल नहीं खाता था, इसलिए उसने उस लड़की से दूर रहने का फैसला किया। मेरे मित्रों को अपने बेटे पर इतना गर्व था क्योंकि उनका बेटा यह समझने में सक्षम था कि इस लड़की के साथ दोस्ती या संबंध बनाना अच्छा विचार नहीं है। मैं उसकी सावधानी को समझ सकता था, लेकिन मेरे पास एक अलग दृष्टिकोण था क्योंकि मैं कभी ‘वह लड़की’ थी…

मेरी परवरिश

मेरा जन्म कनाडा के क्यूबेक प्रान्त के एक छोटे से शहर में हुआ था, और हमारा गाँव पारिवारिक परवरिश के लिए एक बेहतरीन जगह थी। दुर्भाग्य से, जब मैं केवल दो साल की थी, तब मेरे माता-पिता का तलाक हुआ, इसलिए मैं अपनी माँ और उसके नए जीवन साथी के साथ बड़ी हुई, और केवल पखवाड़े में एक बार अपने पिता से मिलने गयी। मुझे हमेशा प्यार की कमी महसूस होती थी और वास्तव में येशु से मेरा परिचय नहीं हुआ था। हालाँकि मेरे माता-पिता कैथलिक थे, और मेरी माँ ने यह सुनिश्चित किया कि मुझे कैथलिक सम्प्रदाय के सभी संस्कार मिले। लेकिन वह मुझे रविवारीय मिस्सा पूजा में नहीं ले जाती थी, न ही घर में प्रार्थना करती थी, माला विनती या भोजन से पहले की प्रार्थना भी नहीं। मेरा विश्वास काफी छिछला था। मेरे पिता कनाडा में पले-बढ़े इतालवी थे। उनकी मां एक कट्टर कैथलिक थीं और हर दिन प्रार्थना करना कभी नहीं भूलती थी। यह लज्जजनक बात है कि मैं उनके नक्शेकदम पर नहीं चली… फिर भी मुझे लगता है कि ईश्वर के पास मेरे लिए अन्य योजनाएँ थीं।

जैसे-जैसे मैं बड़ी हो रही थी, अपनी त्वचा के रंग के कारण अन्य बच्चों ने मेरा अस्वीकार कर दिया। मेरी माँ कोस्टा-रिका से हैं इसलिए मैं अन्य फ्रेंच कैनेडियन जैसी नहीं थी। हालाँकि, मैं बहुत सारे दोस्त बनाने में कामयाब रही, लेकिन वे सभी मुझ पर अच्छे प्रभाव डालने में सक्षम लोग नहीं थे। यौवन की शुरुआत के रूप में, मैं एक आकर्षक युवा महिला के रूप में विकसित हुई। मैं अपनी उम्र से बड़ी दिखती थी। मैंने अपने आप को लोकप्रिय बनाने के लिए इसका फायदा उठाया और इसलिए मुझे बॉयफ्रेंड पाने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मेरी माँ ने मुझे वास्तव में कभी भी वह यौन शिक्षा नहीं दी जिसकी मुझे आवश्यकता थी और मैं जिस वातावरण में रह रही थी वह रूढ़िवादी नहीं था, बल्कि ज़रुरत से ज्यादा उदार, अति-उदार था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैंने धोखे के बाद धोखे को झेला। मुझे खालीपन और तन्हाई का एहसास हुआ। मेरी “खुशी” हमेशा अस्थायी थी और जल्द ही, मैं किसी और की बाहों में चली गयी….

प्यार की तलाश

जब मैंने हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की, तो मैंने कॉलेज शुरू करने से पहले एक साल की छुट्टी लेने और अपनी मौसी के साथ रहने के लिए कोस्टा रिका जाने का फैसला किया। चूंकि मेरे पास पहले से ही अपने खुद के फैशनेबल कपड़े, मेकअप, परफ्यूम आदि खरीदने के लिए अंशकालिक नौकरी थी, इसलिए मैंने यात्रा का खर्च उठाने और अकादमी में स्पेनिश सीखने के लिए कुछ पैसे बचाए। मैं छुट्टियों के मौसम में कोस्टा-रिका पहुंची, और वहां बहुत सारे उत्सव हो रहे थे। चूंकि पुरुषों के साथ मेरे रिश्ते हमेशा बुरी तरह अंजाम हो रहे थे, इसलिए मैंने (18 साल की उम्र में) तय कर लिया था कि मैं पुरुषों के साथ नहीं रहूंगी। मैंने इसके बजाय परिवार के साथ समय बिताने का संकल्प लिया, लेकिन ईश्वर के पास मेरे लिए कुछ और ही था…

मेरे आने के पाँच दिन बाद, मेरा मौसेरा भाई मुझे एक बार-सह-रेस्तरां में ले गया जहाँ उसकी मुलाक़ात कुछ दोस्तों से होनी थी। जैसे ही हम बैठे, एक बहुत सुन्दर लड़का मुझे देखकर मुस्कुराया। मैं शरमा गयी और वापस मुस्कुरायी। उसने पूछा कि क्या वह हमारे साथ शामिल हो सकता है, और मैंने सहर्ष हाँ कर लिया। हम दोनों ने तत्काल आपसी आकर्षण महसूस किया और अगले दिन फिर से मिलने का जुगाड़ बनाया, और अगले दिन, और अगले दिन… और इसी तरह हमारी मुलाक़ातों का सिलसिला जारी रहा। हमारी सांस्कृतिक भिन्नताओं के बावजूद, हमारे बीच बहुत कुछ समान था और हम इस तरह से जुड़ने में सक्षम थे जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे। उसने मुझसे कहा, “मेरे लिए सबसे ज्यादा आपके दिमाग में और आपके दिल में क्या है, यही मायने रखता है।” इससे पहले मुझसे किसी ने कभी ऐसा कुछ नहीं कहा था।

विलियम और मैं एक दुसरे के बहुत ही नज़दीक हो गए। हमारे एक साथ कहीं निकलने से पहले वह मुझे उसके साथ मिस्सा बलिदान में जाने के लिए आमंत्रित करता था। हालाँकि मैंने मिस्सा बलिदान पर अधिक ध्यान नहीं दिया, फिर भी मुझे खुशी हुई क्योंकि मैं उसके साथ थी। फिर उसने मुझे उसके माँ बाप के साथ कार्टागो के महागिरजाघर की तीर्थयात्रा पर जाने के लिए आमंत्रित किया जिसमें चार घंटे की पैदल यात्रा शामिल थी। मैं तीर्थयात्रा में तो गयी, लेकिन मेरा जाना वास्तव में अपने विश्वास से प्रेरित नहीं था।

एक अलौकिक अनुभव

मैं महागिरजाघर में आने वाले हजारों लोगों को देखकर आश्चर्यचकित थी, जो धन्य कुँवारी मरियम से कोई निवेदन मांग रहे थे, या माँ के द्वारा प्राप्त एहसानों के लिए धन्यवाद दे रहे थे। यह नज़ारा अतुल्य था। उनमें से हर एक व्यक्ति महागिरजाघर में प्रवेश करता, घुटने टेकता और गलियारे में अपने घुटनों पर चलकर यानी रेंगते हुए, वेदी तक पहुंचता। जब हमारी बारी आई, तो मैं बिल्कुल ठीक महसूस कर रही थी, लेकिन जैसे ही मैं नीचे झुकी, मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी हवा खत्म हो गई हो। मेरे गले में एक बड़ी गांठ बन गई और मैं फूट-फूट कर रोने लगी। मैं एक बच्चे की तरह रोती हुई घुटनों पर चलती हुई वेदी तक पहुंची। विलियम ने मेरी ओर देखा, वह सोच रहा था कि यह सब क्या हो रहा है, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। बाद में जब हम बाहर निकले, तो उसकी माँ सांद्रा ने मुझसे पूछा कि क्या हुआ था। “मुझे नहीं पता,” मैं हांफने लगी। उसने कहा कि येशु मेरे दिल में रहने के लिए आए थे। मुझे पता था कि वह सही थी। यह किसी ऐसे व्यक्ति से, जिसे आप गहराई से प्यार करते हैं, उससे लंबे अलगाव के बाद मिलने जैसा था। कुछ अलौकिक, जो मेरे नियंत्रण से बाहर था, मुझ पर हावी हो रहा था।

उस क्षण से, मैं एक नई व्यक्ति की तरह महसूस करने लगी और मेरा जीवन नए सिरे से शुरू हो रहा था। 11 साल की उम्र में मेरे दृढीकरण संस्कार के बाद, अब पहली बार विलियम मुझे पापस्वीकार संस्कार में ले गया। मेरे पापों की सूची बहुत लंबी थी… मुझे लगता है कि पुरोहित मेरे पापों की लम्बी फेहरिस्त को सुनने के बाद कमरे में जाकर आराम करना चाह रहे थे। “मेरे पास बहुत काम है” कहकर वे जल्दी निकल गए!

विलियम और मैंने चार साल बाद शादी की, और ईश्वर ने हमें तीन सुंदर बेटों का वरदान दिया। 2016 में हमने अपने परिवार को मरियम के निष्कलंक हृदय को समर्पित किया। मेरा विश्वास लगातार बढ़ता गया। मैंने विभिन्न सेवकाइयों में कलीसिया की सेवा शुरू की: हाल ही में एक धर्मशिक्षक और प्रचारक के रूप में। परमेश्वर ने वास्तव में मेरे जीवन को एक अलग दिशा में मोड़ दिया है। वह मेरी आत्मा को चमकाना जारी रखता है, वह मुझे अपनी सर्वत्तम कृति में गढ़ता है। चुनौतीपूर्ण अवसर भी उसकी योजना का हिस्सा है। जब मैं अपने जीवन के क्रूस को अपनाती हूँ और उसका अनुगमन करती हूँ, तो वह मुझे अपने राज्य की ओर ले जाता है। येशु ने मुझे अपनी तरह सेवा करने के लिए चुना।

जब मैं अपनी छोटी छोटी झुंझलाहट और छोटे अपमानों को बलिदान में उसको समर्पित करती हूं, तो वह उन्हें मेरी कल्पना से कहीं अधिक अच्छाई में बदल देता है, क्योंकि उसने मुझे बदल दिया है।

उस गर्मी की छुट्टी के दिन अपने दोस्तों द्वारा कही गयी बातों पर जैसे ही मैंने विचार किया, मैंने अपने पुराने व्यक्तित्व के बारे में सोचा, मैं कितनी खो गयी थी, और कैसे विलियम से मिलने के उत्प्रेरक के माध्यम से परमेश्वर ने मेरे जीवन को पूरी तरह से बदल दिया। मैंने उन्हें सलाह दी कि वे अपने बेटे को प्रोत्साहित करें कि वह किसी मित्रता को जल्दबाजी में अस्वीकार न करें, बल्कि अपनी आत्मा में परमेश्वर के प्रकाश को चमकने दें। शायद ईश्वर की कोई अच्छी योजना है…

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By: Claudia D’Ascanio

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जून 03, 2023
Evangelize जून 03, 2023

क्या आप जीवन की अनिश्चितताओं से परेशान हैं? हिम्मत मत हारिये। एक समय मैं भी उन परिथितियों में फंसी थी – लेकिन येशु ने मुझे इससे बाहर निकलने का मार्ग दिखाया।

एक दिन जब मैं तीस साल की थी, अपनी पसंदीदा हवादार आसमानी रंग का कपड़ा पहनकर शहर में टहल रही थी। यह कपड़ा मुझपे अच्छा लगता था, इसलिए मैं इसे अक्सर पहनती थी। बिना किसी चेतावनी के मैंने अचानक एक दुकान की खिड़की में अपना प्रतिबिंब देखा। मैं अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर पाई। मैंने अपने उभरते हुए पेट को अन्दर दबाने की कोशिश की। पर यह मुमकिन नहीं था। मेरे शारीर में हर जगह उभार था। मेरे रुधिर वहिकाओं के नीचे मेरे पैर सुखाये हुए सूअर के मांस की तरह लग रहे थे। मुझे अपने आप से घृणा महसूस हुई।

लापरवाह

मेरा खाना और वजन नियंत्रण से बिलकुल बाहर हो गया था; और इससे से भी बढ़कर, मेरा पूरा जीवन एक रेल दुर्घटना के समान हो गया था। हाल ही में तलाक मेरे वैवाहिक जीवन को बर्बाद कर चुका था। बाहर से तो मैं दिखावा करती थी कि सब कुछ ठीक है, लेकिन अंदर ही अंदर मैं टूट चुकी थी।
चर्बी की दीवारों के पीछे अलग-थलग रहते हुए, मैंने अपनी पीड़ा किसी से साझा नहीं की। अपने दर्द को कम करने के लिए, मैंने शराब पी ली, खूब काम किया, और अत्यधिक खाया। डायटिंग के लगातार प्रयासों ने मुझे मोह, आत्म-दया और अत्यधिक भोजन की गुलामी के एक भयंकर चक्र में फंसा दिया।

और इन सभी मलबों के नीचे, आध्यात्मिक समस्याएँ पनप रही थीं। यधपि मैं खुद को कैथलिक कहती थी, लेकिन मैं एक नास्तिक की तरह जीवन बिता रही थी। मेरे लिए ईश्वर तो था, लेकिन बहुत दूर वहां ऊपर, जो मेरे दुखों के बारे में कुछ भी परवाह नहीं करता था। मुझे ऐसे ईश्वर पर थोड़ा भी भरोसा क्यों करना चाहिए? मैं जब केवल अपने माता-पिता से मिलने जाती थी, तभी मैं रविवारीय मिस्सा में जाती थी ताकि उन्हें विश्वास दिला सकूं कि मैं ईमानदारी पूर्वक अपने विश्वास को निभाती हूँ। सच में, मैं अपने मन में ईश्वर के बारे में एक भी विचार लाये बिना अपने दिन बिताती रही और वही करती थी जो मेरी पसंद की थीं।

लेकिन उस खिड़की में अपने प्रतिबिंब की डरा देने वाली स्मृति ने मुझे परेशान कर दिया। एक नई बेचैनी ने मेरी आत्मा को जकड़ लिया। बदलाव जरूरी था, लेकिन यह कैसे होगा? मुझे अनुमान नहीं था। न ही मुझे इस बात का अंदाज़ा था कि परमेश्वर स्वयं उस क्षण में कार्य कर रहा था, और अपनी कोमल उँगलियों से मेरे हृदय के दर्द को मुझे दिखा रहा था।

गोलियथ के साथ मुकाबला

काम पर एक महिला ने अपने खाने और वजन के बारे में अपनी निराशा मुझसे व्यक्त की और हम दोस्त बन गए। एक दिन उसने बारह चरणों वाले एक समूह का उल्लेख किया जिसमें उसने भाग लेना शुरू किया था। वह समूह जोर देकर कहता है कि अव्यवस्थित भोजन हमारे भावनात्मक और आध्यात्मिक जीवन से संबंधित है, इसलिए वजन कम करने और अत्यधिक खाना बंद रखने के लिए उन घटकों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इस एकीकृत दृष्टिकोण ने मुझे आकर्षित किया। इस तरह के समूहों के प्रति मेरी नापसंद के बावजूद, मैंने इस समूह की कुछ बैठकों में भाग लेने की कोशिश की। जल्द ही, मैं नियमित रूप से उपस्थित होने लगी, और हालांकि मैं शायद ही किसी बैठक में एक शब्द भी बोली होगी, बाद में मैं वहा से मिले कुछ सुझावों पर प्रयोग करती थी। इस दृष्टिकोण ने कुछ हद तक काम किया, और कुछ महीनों के बाद जब मेरा वजन कम होने लगा तो मैं बहुत खुश थी। हालाँकि — मैंने इस बात को किसी के सामने उजागर नहीं किया — तब भी मैं अपनी प्रगति के लिए खतरा बना हुआ एक शातिर गोलियथ के साथ संघर्ष कर रही थी।

हर दिन काम पर जाने के दौरान, मैं एक ऐसी आहार योजना का पालन करने लगी जो मुझे संयमित रूप से खाने और प्रलोभनों को कम करने में सहायता करती थी। लेकिन शाम 5:00 बजे तक हर रोज मुझे बहुत तेज भूख लग जाती थी। मैं घर जाती और जब तक थककर बिस्तर पर गिर न जाती तब तक अनियंत्रित रूप से बहुत सारा भोजन अपने मुंह में ठूसती रहती थी। मैं इस राक्षस के सामने शक्तिहीन और भयभीत थी कि मेरे वजन बढ़ता न जाये। मुझे खुद से घृणा हो गई थी। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि मुझे क्या करने की जरूरत थी? ये सब चलता रहा, और निराशा ने मुझे जकड़ लिया।

एक सुझाव मेरे दिमाग में आया

फिर अप्रत्याशित रूप से मेरे दिमाग में सबसे विचित्र विचार आया कि काम से सीधे घर जाने के बजाय, मैं शाम के सवा पाँच बजे वाले मिस्सा बलिदान में भाग ले सकती हूँ। वह कम से कम मेरे खाने को स्थगित कर देगा और इसकी अवधि को एक घंटे कम कर देगा। पहले तो यह विचार दयनीय लगा। क्या यह अस्थायी और बेहूदा नहीं था? लेकिन, चूँकि कोई अन्य विकल्प नज़र नहीं आ रहा था, तो हताशा ने मुझे इसे आज़माने के लिए प्रेरित किया। जल्द ही मैं मिस्सा बलिदान में भाग लेने लगी और प्रतिदिन पवित्र परम प्रसाद ग्रहण करने लगी।
मेरा एक लक्ष्य मेरे अत्यधिक खाने को कम करना था। जाहिर तौर पर, येशु के लिए इतना ही काफी था। वास्तव में अपने शरीर और रक्त में मौजूद येशु वहां मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे, और मुझे वापस पाकर खुश थे। बहुत समय बाद ही मुझे एहसास हुआ कि इन सब में भी उनका एक मकसद था: एक अथाह रूप से ऊंचा, व्यापक और गहरा मकसद। वह सुनिश्चित रूप से जानते थे कि मुझे क्या चाहिए और इसे कैसे प्रदान करना है।

कोमल और दयामय प्रेम के साथ, येशु ने मेरे लड़खड़ाते पैरों को ठोस जमीन पर लाने के लिए मेरी निराशा का इस्तेमाल किया और मेरे दिल को ठीक करने और इसे अपने दिल से जोड़ने की एक लंबी प्रक्रिया शुरू की। प्रत्येक दिन पवित्र मिस्सा में उसने अपने शरीर और रक्त को मुझे खिलाते और पिलाते हुए मेरी बीमारियों को ठीक करना शुरू किया, मुझे अलौकिक अनुग्रहों से भर दिया, मेरे अंधकारमय जीवन में प्रकाश फैलाया, और मुझे उन बुराइयों से लड़ने के लिए तैयार किया जो मुझे डराती थीं।

अंततः मिल गयी मुझे आज़ादी

येशु के यूखारिस्तीय अनुग्रह ने मुझे प्रज्वलित किया और स्फूर्ति प्रदान की, और मैंने कार्यक्रम में अपनी भागीदारी को एक नए स्तर पर पहुँचा दिया। पहले मैंने ऊपरी तौर पर दिलचस्पी ली; अब मैं पूरी तन्मयता के साथ शामिल हो चुकी हूँ, और जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मुझे दो उपहार मिले जो अनिवार्य रूप से उपयोगी साबित हुए: एक सहायक समुदाय जो अच्छे और बुरे दिनों में मेरे साथ रहा, और व्यावहारिक रणनीतियों का एक शस्त्रागार। इनके बिना, मैं हिम्मत हार जाती और हार मान लेती। लेकिन इसके बजाय – एक लंबी अवधि में, जैसा कि मैंने येशु को मेरे लिए उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करना सीखा। आखिर येशु इसी के लिए मर गए थे। जैसे-जैसे मेरी बारह-चरणों की दोस्ती ने मुझे समृद्ध और मजबूत किया, और जैसा कि मैंने ज्ञान और साधनों का उपयोग किया जो मुझे दिया गया था, मैंने पाया कि मुझे अपने अव्यवस्थित खानपान से मुक्ति मिली और एक स्थिर और स्थायी सुधार योजना आज भी जारी है।

इस प्रक्रिया में, विश्वास जो पहले केवल मेरे दिमाग में था, अब मेरे दिल में स्थानांतरित हो गया, और मेरे मन में एक दूरस्थ बेपरवाह परमेश्वर की जो झूठी छवि थी वह छवी टुकड़े-टुकड़े हो गई। येशु, मेरे धन्य उद्धारकर्ता ने जो मुझे अपने करीब लाना जारी रखता है, मेरे बहुत से कड़वी यादों को मीठी यादों में बदल दिया। आज तक मेरे जीवन के अन्य गड्ढों और बंजर भूमि, जो मुझे फलने-फूलने से रोकते हैं, उन्हें बदलने में वह मुझे सहयोग देना जारी रखता है।

आप कैसे हैं? आज आप किन असंभव बाधाओं का सामना कर रहे हैं?

चाहे आप अपने खाने के बारे में परेशान हों, किसी ऐसे प्रियजन के बारे में परेशान हों जिसने विश्वास छोड़ दिया हो, या अन्य बोझों से कुचले गये हो, तो हिम्मत न हारें, दिल थाम लीजिए। पवित्र यूखरिस्त और आराधना में येशु को गले लगाइये। वह आपका इंतजार कर रहे हैं। अपना दर्द, अपनी कड़वाहट, अपनी गंदगी उसके पास ले आइए। वह आपकी सहायता के लिए उसी तरह ही आना चाहते हैं जिस तरह उसने मुझे मेरे सारे संकटों में बचाया था। कोई भी समस्या चाहे वह बहुत बड़ी हो या बहुत छोटी, सब कुछ उसके पास लाया और सुलझा जा सकता है।

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By: Margaret Ann Stimatz

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मार्च 24, 2023
Evangelize मार्च 24, 2023

भय, चिंता और अवसाद से बाहर निकलने का उपाय क्या है?

मसीही लोग मानते हैं कि ईश्वर तीन व्यक्तियों का एक ईश्वर है। हम पिता ईश्वर, पुत्र ईश्वर, और पवित्र आत्मा ईश्वर में विश्वास करते हैं। तथापि, व्यवहारिक रूप से, हम पवित्र त्रीत्व के पहले दो व्यक्तियों पर अपना ध्यान अधिक केन्द्रित करते हैं – हम अपने पिता ईश्वर से प्रार्थना करते हैं और विश्वास करते हैं कि उसने हमारे उद्धार के लिए अपने पुत्र येशु को भेजा। और, जबकि हम पहचानते हैं कि पवित्र आत्मा स्वर्गिक “प्रभु और जीवनदाता” है, हम अनायास ही पवित्र आत्मा को भूल जाते हैं और उसे हमें जीवनदान करने का अवसर नहीं देते हैं! आइए हम पेंतेकोस्त की घटना पर दोबारा गौर करें और फिर से खोज करें कि कैसे पवित्र आत्मा हमारे लिए “प्रभु और जीवन दाता” हो सकता है, क्योंकि पवित्र आत्मा के बिना, हमारा विश्वास एक बंजर, आनंदहीन नैतिकतावाद बन जाता है।

प्रेरित चरित का दूसरा अध्याय (पद 1-11) पवित्र आत्मा के साथ प्रेरितों की मुलाकात और बाद में उनके व्यवहार का वर्णन करता है। पचास दिनों की अनिश्चितता के बाद कुछ बड़ा होने वाला है। येशु ने पिछले सप्ताह अपने मिशन को प्रेरितों को सौंपा था, लेकिन क्या वे पुनर्जीवित प्रभु की घोषणा करने के लिए तैयार हैं? क्या वे अपनी शंकाओं और आशंकाओं से छुटकारा पा सकते हैं?

पवित्र आत्मा के आने से सब कुछ बदल जाता है। शिष्यों को अब डर नहीं लगता। इसके पहले उन्हें अपने प्राणों का डर था; अब, वे सब राष्ट्रों को बड़े उत्साह के साथ सुसमाचार का प्रचार करने के लिए तैयार हैं, और उस उत्साह को दबाया नहीं जा सकता। पवित्र आत्मा न तो उनकी सारी कठिनाइयों को और न ही उनके धार्मिक कार्य के विरोध को दूर करता है। लेकिन आत्मा उन्हें एक गतिशीलता प्रदान करता है जो उन्हें पृथ्वी के कोने-कोने तक सुसमाचार की घोषणा करने में सक्षम बनाता है।

यह कैसे हुआ? प्रेरितों के जीवन को मौलिक रूप से बदलने की आवश्यकता थी और यह परिवर्तन आत्मा का उपहार था। पवित्र आत्मा में, त्रीत्व के तीसरे व्यक्ति के संपर्क में वे आये – एक वास्तविक व्यक्ति, न केवल एक शक्ति, बल्कि एक ऐसा व्यक्ति जिसके साथ हम रिश्ता जोड़ सकते हैं। जबकि हम पिता को सृष्टिकर्ता के रूप में और पुत्र को मुक्तिदाता के रूप में जानते हैं, हम आत्मा को पवित्र करने वाले के रूप में जानते हैं, जो हमें शुद्ध करता है। यह पवित्र आत्मा है जो येशु को हमारे भीतर वास करा देता है।

जबकि येशु अब शारीरिक रूप से हमारे बीच मौजूद नहीं है, वह पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे भीतर रहता है। और वह आत्मा शांति लाता है – एक ऐसी शांति जो हमें समस्याओं और कठिनाइयों से मुक्त नहीं करती है, बल्कि हमें अपनी समस्याओं में शांति पाने, दृढ़ रहने और आशा रखने में सक्षम बनाती है, क्योंकि हम जानते हैं कि हम अकेले नहीं हैं! विश्वास कोई समस्या का समाधान देनेवाला उद्यम नहीं है: जब एक समस्या दूर होती है, तो दूसरी उसका स्थान ले लेती है। लेकिन विश्वास हमें आश्वस्त करता है कि ईश्वर हमारे संघर्षों में हमारे साथ हैं| लेकिन विश्वास हमें आश्वस्त करता है कि ईश्वर का प्यार हमारे साथ है, और जिस शांति का वादा येशु ने किया है उसकी मांग हम कर सकते हैं और उसको पा सकते हैं।

आज की उन्मत्त दुनिया में, सोशल मीडिया और हमारे डिजिटल उपकरणों से अत्यधिक आवेशित, हम खुद को हजार दिशाओं में खींचा हुआ पाते हैं, और कभी-कभी हम थक हारकर चकनाचूर हो जाते हैं। फिर हम जल्दी ठीक होने की तलाश करते हैं, कभी-कभी शराब या मादक ड्रग या एक के बाद एक सुखवादी रोमांच के माध्यम से स्व-चिकित्सा का सहारा लेते हैं। ऐसी बेचैनी के दौरान, येशु पवित्र आत्मा के माध्यम से हमारे जीवन में प्रवेश करते हैं और कहते हैं, “तुम्हें शांति मिले!” येशु हम पर आशा का लंगर डालते हैं। जैसा संत पौलुस रोमियों को लिखे अपने पत्र में कहते हैं, “आप लोगों को दासों का मनोभाव नहीं मिला जिस से प्रेरित होकर आप फिर डरने लगे। आप लोगों को गोद लिए गए पुत्रों का मनोभाव मिला, जिससे प्रेरित होकर हम पुकार कर कहते हैं, “अब्बा, हे पिता“ (रोमियों 8:15)।

पवित्र आत्मा सांत्वना दाता है, जो हमारे दिलों में परमेश्वर के कोमल प्रेम को जगाता है। आत्मा के बिना, हमारा कैथलिक जीवन बिखर जाता है। आत्मा के बिना, येशु बस एक दिलचस्प ऐतिहासिक व्यक्ति से थोड़ा अधिक है; लेकिन पवित्र आत्मा के साथ वह जी उठा हुआ प्रभु मसीह है, हमारे जीवन में यहाँ और अभी एक शक्तिशाली, जीवित उपस्थिति है। आत्मा के बिना, पवित्र ग्रन्थ बाइबिल एक मृत दस्तावेज़ है। परन्तु, आत्मा के साथ, बाइबिल परमेश्वर का जीवित वचन, जीवन का वचन बन जाती है। जीवित परमेश्वर हमसे बात करता है और अपने वचन के द्वारा हमें नया बनाता है। आत्मा के बिना ईसाई धर्म आनन्दहीन नैतिकतावाद है; आत्मा के साथ, हमारा विश्वास ही जीवन है – ऐसा जीवन जिसे हम जी सकते हैं और दूसरों के साथ साझा कर सकते हैं।

हम पवित्र आत्मा को अपने हृदयों और आत्माओं में कैसे आमंत्रित कर सकते हैं? एक तरीका है; एक सरल प्रार्थना का पाठ करना: “आओ, पावन आत्मा”। पवित्र आत्मा के साथ अपने संबंध को गहरा करने का एक और तरीका पवित्र आत्मा के सात वरदानों पर विचार करना है, जो हमें दृढीकरण संस्कार पर प्राप्त होते हैं। प्रज्ञा, विवेक, परामर्श, धैर्य, ज्ञान, पवित्रता और प्रभु का भय पर एक टीका खोजें और इन वरदानों को अपने दैनिक जीवन में समन्वित करने का प्रयास करें। आप आत्मा के वरदानों को जी रहे हैं या नहीं, यह जानने का एक अच्छा तरीका है कि आप  अपने से पूछें कि क्या आपका जीवन पवित्र आत्मा के फलों को प्रकट करता है या नहीं (यह बात गलातियों के नाम पौलुस के पत्र 5:22-23 में लिखा हुआ है)। यदि आपके जीवन में प्रेम, आनंद, शांति, सहनशीलता, मिलनसारी, दयालुता, ईमानदारी, विश्वास, सौम्यता और संयम मौजूद हैं, तो आप जानते हैं कि पवित्र आत्मा आप में कार्य कर रहा है!

प्रार्थना: आ जा, हे पावन आत्मा, अपने विश्वासियों के हृदयों को भर दे और हममें अपने दिव्य प्रेम की आग जला दे! अपने वरदानों से हमें संपन्न कर और हमारे जीवन को उपजाऊ भूमि बना जो बहुतायत में प्रेम, आनंद, शांति, सहनशीलता, मिलनसारी, दयालुता, ईमानदारी, विश्वास, सौम्यता और आत्म-संयम पैदा करती है। आमेन।

 

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By: डीकन जिम मैकफैडेन

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मार्च 23, 2023
Evangelize मार्च 23, 2023

प्रश्न – कैथलिक लोग क्रूस का चिन्ह क्यों बनाते हैं? इसके पीछे क्या प्रतीकवाद है?

उत्तर – कैथलिक होने के नाते, हम प्रत्येक दिन कई बार क्रूस के चिन्ह की प्रार्थना करते हैं। हम यह प्रार्थना क्यों करते हैं, और इन सब के पीछे मतलब क्या है?

सबसे पहले, विचार करें कि हम क्रूस का चिन्ह कैसे बनाते हैं। पश्चिम की कलीसिया में, लोग एक खुले हाथ का उपयोग करते हैं – जिसका उपयोग आशीर्वाद देने में किया जाता है (इसलिए हम कहते हैं कि हम “स्वयं को आशीर्वाद देते हैं”)। पूर्व में, वे पवित्र त्रीत्व (पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा) के संकेत के रूप में तीन अंगुलियों को एक साथ रखते हैं, जबकि अन्य दो उंगलियां भी मसीह की दिव्यता और मानवता के संकेत के रूप में एक हो होती हैं।

हम जो शब्द कहते हैं उसके द्वारा हम त्रीत्व के रहस्य को स्वीकार करते हैं। ध्यान दें कि हम कहते हैं, “पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम पर…” सिर्फ “पिता और पुत्र और पवित्र आत्मा के नामों पर” नहीं, – परमेश्वर एक है, इसलिए हम कहते हैं कि उसका केवल एक ही नाम है – और फिर हम पवित्र त्रीत्व के तीन व्यक्तियों के नाम लेते हैं। हर बार जब हम प्रार्थना शुरू करते हैं, तो हम पहचानते हैं कि हमारे विश्वास का सार यह है कि हम एक ऐसे ईश्वर में विश्वास करते हैं जो तीन होते हुए भी एक है: एकता और त्रीत्व दोनों।

जैसा कि हम अपने विश्वास का अंगीकार और घोषणा करते हैं, हम स्वयं पर क्रूस के चिह्न से मुहरबंद करते हैं। आप सार्वजनिक रूप से अपने ऊपर चिह्न लगा रहे हैं कि आप कौन हैं और आप किसके हैं या किससे संबंधित हैं! यदि आप चाहें तो क्रूस हमारी छुड़ाई की रकम है, हमारा “मूल्य-चिह्न” है, इसलिए हम स्वयं को याद दिलाते हैं कि हम क्रूस द्वारा खरीदे गए हैं। इसलिए जब शैतान हमें लुभाने आता है, तो हम उसे यह दिखाने के लिए क्रूस का चिन्ह बनाते हैं कि हम पर पहले से ही निशान लगा हुआ है!

एज़किएल की पुस्तक में एक अद्भुत कहानी है, जहाँ एक स्वर्गदूत एज़किएल के पास आता है और उसे बताता है कि परमेश्वर पूरे इस्राएल को उसकी बेवफाई के लिए दंडित करने जा रहा है – लेकिन अभी भी यरूशलेम में कुछ अच्छे लोग बचे हैं, इसलिए स्वर्गदूत घूमता है और उन लोगों के माथे पर निशान लगा देता है जो अभी भी परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य हैं। वह जो चिह्न बनाता है वह “ताऊ” है – इब्रानी वर्णमाला का अंतिम अक्षर, और इसे एक क्रूस की तरह खींचा जाता है! परमेश्वर उन पर दया करता है जिन पर ताऊ चिन्हित है, और जिन पर यह चिन्ह नहीं है, उन्हें वह मार डालता है।

उसी तरह, हममें से जो क्रूस के साथ अंकित हैं, परमेश्वर के न्याय के दिन उनके दंड से सुरक्षित रहेंगे, और बदले में उनकी दया प्राप्त करेंगे। प्राचीन मिस्र में, परमेश्वर ने इस्राएलियों से फसह के पर्व पर मेमने के लहू को अपने दरवाजे पर लगाने को कहा था, ताकि वे मृत्यु के दूत से बचाए जा सकें। अब, हमारे शरीर पर क्रूस के द्वारा अंकित होकर, हम मेमने के लहू का आह्वान करते हैं, ताकि हम मृत्यु की शक्ति से बच जाएं!

परन्तु हम क्रूस के चिन्ह को कहाँ अंकित करें? हम इसे अपने माथे, अपने दिल और अपने कंधों पर लगाते हैं। क्यों? क्योंकि हमें इस पृथ्वी पर परमेश्वर को जानने, प्रेम करने और उसकी सेवा करने के लिए रखा गया है, इसलिए हम मसीह को हमारे मनों, हमारे हृदयों (हमारी इच्छा और प्रेम) और हमारे कार्यों का राजा बनने के लिए आग्रह करते हैं। हमारे जीवन के हर पहलू को क्रूस के चिन्ह के अधीन रखा गया है, ताकि हम उसे जान सकें, उससे प्रेम कर सकें और उसकी सेवा कर सकें।

क्रूस का चिन्ह एक अविश्वसनीय रूप से शक्तिशाली प्रार्थना है। अक्सर इसे प्रार्थना की प्रस्तावना के रूप में प्रयोग किया जाता है, लेकिन इसमें अपने आप में अपार शक्ति होती है। प्रारंभिक कलीसिया के उत्पीड़न के दौरान, कुछ मूर्तीपूजकों ने प्रेरित संत योहन को मारने की कोशिश की क्योंकि उनका उपदेश कई लोगों को देवी-देवताओं से दूर कर ख्रीस्तीय धर्म अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा था। मूर्तिपूजकों ने योहन को रात के भोजन के लिए आमंत्रित किया और उसके प्याले में जहर मिला दिया। परन्तु भोजन आरम्भ करने से पहले, योहन ने अनुग्रह की प्रार्थना की और अपने प्याले के ऊपर क्रूस का चिन्ह बनाया। तुरन्त एक साँप प्याले से बाहर रेंगता हुआ निकला, और योहन किसी तरह की हनी के बिना सकुशल बच निकलने में सफल रहा।

संत जॉन वियानी के शब्दों पर ध्यान दें: “क्रूस का चिह्न शैतान के खिलाफ सबसे भयानक हथियार है। इस प्रकार, कलीसिया न केवल यह चाहती है कि क्रूस का चिन्ह हमारे पास और हमारे दिमाग के सामने लगातार  रहे, हमें यह याद दिलाने के लिए कि हमारी आत्मा का मूल्य क्या है और येशु मसीह के लिए इसका मूल्य क्या है, लेकिन यह भी कि हमें हर मोड़ पर क्रूस का चिन्ह खुद बनाना चाहिए: जब हम सोने के लिए जाते हैं, जब हम रात में जागते हैं, सुबह जब हम उठते हैं, जब हम कोई काम शुरू करते हैं, और सबसे बढ़कर, जब हम परीक्षा में पड़ते हैं,तब हमें  क्रूस का चिन्ह बनाना चाहिए।”

क्रूस का चिन्ह हमारे पास सबसे शक्तिशाली प्रार्थनाओं में से एक है – यह पवित्र त्रीत्व का आह्वान करता है, हमें क्रूस के रक्त से मुहरबंद करता है, शैतान को भगाता है, और हमें याद दिलाता है कि हम कौन हैं। आइए हम उस चिन्ह को भक्ति के साथ, श्रद्धा के साथ, सावधानी के साथ बनाएं, और हम इसे पूरे दिन में बार-बार बनाएं। हम कौन हैं और हम किसके हैं, इसका यह बाहरी संकेत है।

 

 

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By: फादर जोसेफ गिल

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मार्च 09, 2023
Evangelize मार्च 09, 2023

क्या आप ने विश्व युवा दिवस के बारे में सुना है? सिस्टर जेन एम. एबेलन आपको एक मौका लेने और स्वर्ग को पृथ्वी पर लानेवाले इस अविश्वसनीय उत्सव का अनुभव करने के लिए प्रेरित करती है

जिस दिन संत पापा जॉन पॉल द्वितीय नए पोप के रूप में “डरिये  मत!” शब्दों के साथ प्रकट हुए, उसी दिन से मैं ने उनका बहुत सम्मान किया और उनका अनुसरण किया। युवाओं के साथ काम करने में मुझे उन्हीं से प्ररणा मिली है, क्योंकि युवाओं के लिए उनके पास एक विशेष आकर्षण और गुण था। 1984 और 1985 में, उन्होंने खजूर रविवार के दिन युवाओं को उनके साथ रोम में शामिल होने के लिए एक विशेष निमंत्रण जारी किया। यह इतना सफल था कि उन्होंने इसे “विश्व युवा दिवस” ​में ​(सप्ताह कहना चाहिए) विस्तारित किया जिसका आयोजन अब हर दो साल में दुनिया भर के किसी न किसी देश में होता है।

पोलैंड में जन्मे एक पत्रकार ने इस बारे में एक अद्भुत अंतर्दृष्टि साझा किया कि कैसे संत पापा जॉन पॉल द्वितीय ने विश्व युवा दिवस के विचार को विकसित किया। “कम्युनिस्ट पोलैंड में कैथलिकों को अपना विश्वास व्यक्त करने में मदद करने केलिए उन्हें तरीके खोजने थे। हर साल, उन्होंने 14-15 अगस्त के लिए ब्लैक मैडोना का तीर्थ स्थल जसना गोरा की तीर्थयात्रा का आयोजन किया। उन्होंने पाया कि इससे लोगों का आपसी संबंध अच्छा बना और उनका विश्वास भी मज़बूत हुआ।”

हालाँकि मैं अब किशोरी या युवती नहीं हूँ, इसके बावजूद, परमेश्वर ने अपने विधान में मेरे लिए उत्तरी अमेरिका में आयोजित विश्व युवा दिवस में भाग लेने का अवसर दिया। विश्व युवा दिवस की अभिकल्पना 16-35 आयु वर्ग के लिए बनायी गयी है, लेकिन पुरोहितों, धर्म बहनों और धर्म बंधुओं, परिवारों और पुराने संरक्षकों को भी इसमें भाग लेने का अवसर दिया जाता है। लिस्बन, पुर्तगाल में सन 2023 के 1 से लेकर 7 अगस्त तक आयोजित विश्व युवा दिवस में जाने के लिए एक वर्ष से भी कम समय है, इसलिए मैं अपने कुछ अनुभव यहाँ साझा कर रही हूं ताकि आपको तीर्थयात्रा में शामिल होने, दूसरों को भाग लेने में मदद करने में और प्रार्थना में शामिल होने के लिए प्रेरणा मिले ।

विश्वा युवा दिवस 1993संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलोराडो के डेनवर में

संत पापा जॉन पॉल द्वितीय 1993 में अमेरिका में पहले विश्व युवा दिवस के लिए डेनवर आने वाले थे। मैंने इसके साथ जुड़ने के लिए हमारे महाधर्मप्रांत में एक स्थानीय कार्यक्रम की योजना बनाना शुरू किया। इस कार्यक्रम के बाद मैंने सलेशियन फादर लोगों द्वारा कम कीमत पर दिए जा रहे एक अधिशेष “पैकेट” के बारे में पढ़ा, जिसके अंतर्गत आने जाने केलिए हवाई जहाज का टिकट और होटल में रहने की सुविधा शामिल थी। मैं ने एक स्थानीय युवा समूह के साथ इसमें भाग लेने की व्यवस्था की।

डेनवर विश्व युवा दिवस का आदर्श वाक्य था: “मैं तुम्हें परिपूर्ण जीवन देने आया हूँ” (योहन 10:10)। जैसे ही हम वहां के हवाई अड्डे में पहुंचे, उसी क्षण से परमेश्वर की स्तुति में दुनिया भर की भाषाओं में गीत गाने वाले युवा वयस्कों की हर्षित ध्वनि को हमने सुना और महसूस किया कि इसका हम पर अच्छा प्रभाव हो रहा है। यह आनंददायक शोर शुरुवाती दिनों से जारी रहा। युवा लोगों और उनके संरक्षकों का उल्लासपूर्ण उत्साह स्वर्ग के पूर्वाभास की तरह था क्योंकि वे हंसते थे, भोजन साझा करते थे, मुस्कुराते थे और गहन संवाद करते थे। वे जहां भी गए, उन्होंने सड़कों पर अपने बैनर और झंडे लहराते हुए गाया, नृत्य किया और प्रार्थना की। जैसे-जैसे लोग मेल-मिलाप के संस्कार को ग्रहण करने, यूखरिस्तीय आराधना में चौबीसों घंटे प्रार्थना करने और भक्तिमय, प्रार्थनामय मिस्सा पूजा के लिए एकत्रित हुए, आशीषों की धारा प्रवाहित होने लगी। जब संत पापा जॉन पॉल पहुंचे, तो तालियों की गड़गड़ाहट और “जॉन पॉल द्वितीय, हम आपसे प्यार करते हैं” का नारा लगाते हुए उनका स्वागत किया गया।

विश्व युवा दिवस का समापन अंतिम पवित्र मिस्सा बलिदान के स्थल तक पद यात्रा के साथ शुरू हुआ। तीर्थयात्री 15 मील चल सकते थे, या ट्रॉली से सफ़र करने के बाद सिर्फ 3 मील पैदल चल सकते थे। मैंने 33 डिग्री सेल्सियस की गर्मी वाले उस दिन ट्राली से जाना तय किया, लेकिन संत पापा के साथ शाम की प्रार्थना के बाद, डेनवर की ऊँचाई पर स्थित उस मैदान का तापमान 4 डिग्री तक नीचे आ गया। हालाँकि मैं ठण्ड से ठिठुर रही थी क्योंकि मैं गर्म कपड़े नहीं लाई थी, लेकिन स्पेनिश और फ्रांसीसी युवाओं ने पूरी रात नृत्य करके मेरा मनोरंजन किया। अगले दिन की सुबह, हमारे शरीर में गर्माहट लौट आई क्योंकि हम अंतिम मिस्सा बलिदान की तैयारी के लिए अच्छे भविष्य की आशा के साथ अपने स्लीपिंग बैग से बाहर निकले।

संत पापा जॉन पॉल द्वितीय ने अपने सामने एकत्रित लाखों लोगों के लिए दिए दिलचस्प उपदेश में, हमें “जीवन की संस्कृति” को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय होने की चुनौती दी ताकि गर्भनिरोधक दवा, गर्भपात, इच्छा मृत्यु, तलाक, निराशा और आत्महत्या को बढ़ावा देने वाली “मौत की संस्कृति” द्वारा बरबाद की जा रही तबाही का मुकाबला किया जा सके। इस आह्वान ने स्टुबेनविले के फ्रांसिस्कन विश्वविद्यालय में शुरू हुई सेवा “क्रॉसरोड्स” और अन्य कई नई सेवाओं के गठन को प्रेरित किया, और तीन देशों में प्रो-लाइफ वार्षिक ग्रीष्मकालीन तीर्थयात्राओं में विस्तारित हुआ, युवा लोग प्रार्थनामय बलिदान द्वारा सार्वजनिक रूप से उन समुदायों के साक्षी बने।

विश्व युवा दिवस 2002, कनाडा के टोरंटो में

2002 में, कनाडा के टोरंटो शहर में संत पापा जॉन पॉल द्वितीय के अंतिम विश्व युवा दिवस में भाग लेने के लिए मुझे मौका मिला था। किसी उदार व्यक्ति ने मेरा खर्च उठा लिया। हालाँकि संत पापा अब उम्र के साथ झुक गये थे, और पार्किंसंस रोग से काँप रहे थे, फिर भी उनके पास मिशन को आगे बढ़ाने के लिए एक नई पीढ़ी को प्रेरित करने और उनमें जोश भरने की क्षमता थी। हालाँकि रविवार की सुबह मूसलाधार बारिश हुई थी, फिर भी मैं इस उम्मीद पर टिकी रही कि मौसम साफ हो जाएगा। उस दिन का सुसमाचार मत्ती 5 से लिया गया था। जैसे ही, “तुम जगत की ज्योति हो,” यह वचन (मत्ती 5:14) स्टेडियम में गूँज उठा, सूरज बादलों को चीर कर निकल आया।

संत पापा का उपदेश सीधे उनके चरवाहा वाले हृदय से निकल आया: “दुनिया के घोर अंधकार में येशु मसीह प्रकाश हैं। अंधेरे में मत फंसो। हालांकि मैं बहुत अधिक अंधकार से गुजरा हूं… मैंने दृढ़ता से आश्वस्त होने के लिए पर्याप्त साक्ष्य देखे हैं कि कोई भी कठिनाई, कोई भी भय इतना बड़ा नहीं है कि यह उस आशा का दम घोंट दे जो युवाओं के दिलों में हमेशा जागृत है।“

उन्होंने सीधे-सीधे यौन-दुर्व्यवहार कांड के बारे में बताया जो हाल ही में प्रकाश में सामने आया था: “अंधकार के पापों से हतोत्साहित न हों, चाहे वह अन्धकार पुरोहितों और धर्म संघियों में भी विद्यमान हो। लेकिन (वे ऊँची आवाज़ में बोले) बहुत से अच्छे पुरोहितों और धर्म संघी लोगों को याद करें जिनकी एकमात्र इच्छा सेवा करना और भलाई करना है।” उन्होंने युवाओं को धर्मसंघीय और पुरोहितीय बुलाहटों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया, – “क्रूस के राजकीय मार्ग” पर चलने के लिए भी जिस पर कठिन दौर में चलते हुए, “पवित्रता की खोज और भी जरूरी हो जाती है।” उस वर्ष कई बुलाहटों का जन्म हुआ।

जब हमारे संत पापा ने अगला युवा सम्मलेन का स्थान 2005 में कोलोन, जर्मनी में होने की घोषणा की, तो उन्होंने कहा, “येशु मसीह वहां आपसे मिलेंगे।” मेरे दिल की धड़कन रुक गई और मेरी आंखों में आंसू भर आए, क्योंकि संत पापा जॉन पॉल अक्सर कहा करते थे, “मैं आप से मिलूंगा।” मैं जानती थी, हम सब जानते थे, कि उन्हें मालूम था कि उनके अंतिम दिन निकट हैं।

2005 और उसके बाद

अगस्त 2005 में संत पापा बेनेदिक्ट जब दुनिया भर के युवाओं से मिलने के लिए कोलोन की राइन नदी में जलयात्रा कर रहे थे तब मैं अपने पिताजी के साथ (जो मरने के कगार पर थे) बैठकर टेलीविजन पर संत पापा को  देख रही थी क्योंकि मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि जो संत पापा जॉन पॉल द्वितीय के उत्तराधिकारी बने थे, वे उसी देश के मूल निवासी थे, जिसे अगले विश्व युवा दिवस के पहले ही चयनित किया जा चुका है! 2013 में भी ऐसा ही हुआ था। अंटार्टिका को छोड़कर, हर महाद्वीप के युवा, ब्राजील के रियो डी जनेरियो में विश्व युवा दिवस के लिए तैयार हो गए, तभी संत पापा बेनेदिक्ट ने इस्तीफा दे दिया, और पहले से चयनित महाद्वीप से ही संत पापा फ्रांसिस उनके उतराधिकारी बने। संत पापा बेनेदिक्ट और पोप फ्रांसिस दोनों ने अपने पूर्वाधिकारी की विरासत को पूरी तरह से अपनाया। विश्व युवा दिवस युवाओं को पवित्रता के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते रहे हैं।

विश्व युवा दिवस 2023, पुर्तगाल के लिस्बन में  

दुनिया भर के युवा अब अगले विश्व युवा दिवस के लिए लिस्बन की यात्रा करने की योजना बना रहे हैं। मेजबान देश युवाओं को पूरे पुर्तगाल के विभिन्न धर्म्प्रान्तो में ठहराकर वहां की संस्कृति का अनुभव कराने के लिए कई दिनों से योजना बना रहा है, और उनके पास कलीसिया के कुछ सर्वश्रेष्ठ वक्ताओं, संगीतकारों और कलाकारों का प्रवचनों, कार्यशालाओं और विभिन्न कार्यक्रमों से भरा एक आकर्षक परिपाटी है। स्थानीय परिवार, स्कूल और पल्ली युवा तीर्थयात्रियों को समायोजित करने की तैयारी कर रहे हैं। मेलमिलाप का संस्कार और यूखरिस्त की आराधना हर जगह होगी और कुछ प्रार्थना दल पहले से ही अपेक्षित आगंतुकों के लिए प्रार्थना कर रही हैं। दुनिया भर के देशों में तीर्थयात्रियों के समूह बनाए जा रहे हैं, और अपने युवाओं को भाग लेने में सहायता करने के लिए पल्ली के लोग धन एकत्रित कर रहे हैं। यदि परमेश्वर आपको वहाँ बुला रहा है, तो वहाँ पहुँचने में वह आपकी मदद कर सकता है, और आपको जीवन की यात्रा पर आगे बढ़ने में आपकी मदद कर सकता है। यह विश्व युवा दिवस हमारे समय में कैथलिक कलीसिया के खजानों में से एक है। (आधिकारिक प्रोमो, पांच भाषाओं में गीत, लोगो और दृश्यों के लिए आप अपने धर्मप्रांत के वेबसाइट, यूट्यूब और फेसबुक देखें)।

जो लोग शामिल नहीं हो सकते वे सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ कार्यक्रमों में भाग ले सकते हैं और तीर्थयात्रियों के साथ प्रार्थना कर सकते हैं।

 

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By: Sister Jane M. Abeln SMIC

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दिसम्बर 03, 2022
Evangelize दिसम्बर 03, 2022

नाकहने का मतलब अपने परिवार को आर्थिक तंगी के अँधेरे में धकेलना होगा, फिर भी उसने वह कड़ा कदम उठाया…

मैं भारत की रहनेवाली 31 वर्षीय पूर्व सहायक प्रोफेसर हूं। ‘पूर्व’ इसलिए कि कई महीनों पहले मैं उस उपाधि को छोड़ चुकी हूँ। 2011 में कॉलेज से स्नातक की डिग्री पाने के बाद, मैंने अगले चार साल चार्टर्ड अकाउंटेंसी कोर्स की तैयारी में बिताए। मुझे जल्द ही एहसास हुआ कि सी.ए. करना मेरी बुलाहट नहीं थी, और मैं उससे बाहर हो गयी।

सपना साकार हो गया

आकर्षक करियर को छोड़ना बहुतो को मूर्खतापूर्ण लग सकता है, लेकिन मेरे निर्णय ने मुझे अपने वास्तविक जुनून को पहचानने और स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। वह है अध्यापन, एक ऐसा कार्य जिस का सपना मैं बचपन से देखा करती थी। जब मैंने अपना ध्यान अध्यापन करियर पर स्थानांतरित कर दिया, तब ईश्वर ने मुझे एक प्रसिद्ध विद्यालय  के प्राथमिक खंड में पढ़ाने का वरदान दिया। हालाँकि मैंने उस स्कूल में चार साल तक पढ़ाया था, लेकिन मैं संतुष्ट नहीं थी, क्योंकि मेरे बचपन का सपना कॉलेज में प्रोफेसर बनने का था। ईश्वर की कृपा से, लगभग चार वर्षों के अध्यापन के बाद, मुझे एक स्थानीय कॉलेज में सहायक प्रोफेसर के रूप में आवेदन करने का अवसर प्राप्त हुआ। जब मुझे नौकरी की पेशकश की गई, तो मैंने खुशी-खुशी एक सहायक प्रोफेसर के रूप में अपने सपने को पूरा किया और दो साल के लिए मेरे छात्रों की जरूरतों को पूरा किया।

मुश्किल निर्णय

मेरे तीसरे वर्ष के बीच में, हमारे कॉलेज ने गुणवत्ता दर्जा (अक्रेडिटेशन) की प्रक्रिया शुरू की, जो कि उच्च शिक्षा के संस्थानों को ‘गुणवत्ता की स्थिति’ का प्रमाण देती है । हालांकि यह एक लंबी, श्रमसाध्य प्रक्रिया थी, जिसमें बहुत अधिक कार्यभार था, लेकिन शुरुआत में चीजें सुचारू रूप से आगे बढ़ीं। लेकिन अंततः, हम पर अनैतिक व्यवहार में भाग लेने के लिए दबाव डाला गया जिससे मैं बहुत परेशान होने लगी। प्रशासन ने हमें नकली रिकॉर्ड बनाने और ऐसी अकादमिक गतिविधियों (जो गतिविधियाँ कभी हुई ही नहीं) का दस्तावेजीकरण करने के लिए दबाव बनाया।

मेरे मन में असंतोष और नाराजगी उत्पन्न हुई – वह इतनी मजबूत कि मैं अपनी नौकरी छोड़ना चाहती थी। हालांकि घर में चीजें ठीक नहीं थीं। परिवार में हम चार लोग हैं। मेरे माता-पिता काम नहीं कर रहे थे, और मेरे भाई की नौकरी चली गई थी। परिवार में कमाने वाली मैं इकलौती होने के कारण मेरे लिए नौकरी छोड़ना मुश्किल होगा। महामारी के कारण दूसरी नौकरी ढूंढना भी मुश्किल होगा। इन सबके बावजूद मैंने किसी तरह हिम्मत जुटाई और अपना इस्तीफा सौंप दिया। लेकिन मेरे पर्यवेक्षकों ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया, यह वादा करते हुए कि मुझे अब झूठे दस्तावेज़ बनाने की आवश्यकता नहीं होगी और मैं घर से भी काम कर सकती हूँ। अनिच्छा से, मैंने शर्तों को स्वीकार कर लिया। हालाँकि, महीनों के भीतर, मुझे फिर से एक अकादमिक संगोष्ठी का दस्तावेजीकरण करने के लिए कहा गया, जो संगोष्ठी कभी नहीं हुई थी। हर बार जब मैं इस तरह के कदाचार में लिप्त होती, मुझे ऐसा लगता था कि मैं प्रभु को धोखा दे रही हूँ। मैंने इस दुविधा को अपने आध्यात्मिक गुरुओं के सामने रखा जिन्होंने मुझे ऐसी नौकरी को छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जिसमें प्रभु की महिमा नहीं थी।

किस्मत का खेल  

अंत में, मैंने हिम्मत जुटाई और मैंने अपने पर्यवेक्षकों को ‘ना’ कहा। और यह एक मज़बूत और बड़ा ‘ना’ था। मैंने सौंपे गए कार्य को जमा करने के बजाय अपना इस्तीफा सौंप दिया। मैंने तुरंत नौकरी छोड़ दी और पिछले महीने के अपने वेतन को लेने से इनकार कर दिया क्योंकि मैं बिना नोटिस दिए जा रही थी।

आर्थिक रूप से, मैं घोर अंधकार में कूद चुकी थी। मेरा परिवार मेरी आय पर निर्भर था। मेरी मां की हाल की सर्जरी ने परिवार की बचत को खत्म कर दिया था। मेरे पास मुश्किल से सिर्फ अगले महीने के खर्चे को पूरा करने के लिए पर्याप्त पैसा था। मुझे नहीं पता था कि क्या करना है। मैंने अपने पिता और भाई को अपनी नौकरी छोड़ने के बारे में नहीं बताया क्योंकि वे कभी स्वीकृति नहीं देते।

मैंने केवल वही किया जो मैं कर सकती थी — मैंने प्रभु को दृढ़ता से थामे रखा और उसकी शक्ति और सामर्थ्य पर भरोसा किया। मैंने लगातार पवित्र मालाविनती करके माँ मरियम की मध्यस्थता मांगी। दिन और सप्ताह बीत गए, और मुझे साक्षात्कार के लिए कोई कॉल नहीं आया। डर मेरी आत्मा को जकड़ने लगा। जिन सभी रिक्रूट करनेवालों से मैंने संपर्क किया था, सितंबर के अंत तक, उनकी तरफ से मेरे पास कोई निर्धारित साक्षात्कार नहीं था। मैं हताश थी।

एक अविश्वसनीय आश्चर्य

आखिरकार, 30 सितंबर को, मेरे घर के पास स्थित एक इंटरनेशनल स्कूल से एक फोन आया। मैंने कॉलेज में जिन विषयों को पढ़ाया था, उन्हीं विषयों को इस स्कूल में पढ़ाने के लिए साक्षात्कार का आमंत्रण मुझे मिला। यह एक अविश्वसनीय आश्चर्य था। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम पर आधारित इस स्कूल को किसी भारतीय विश्वविद्यालय में स्नातक संकाय के बराबर विषय ज्ञान के स्तर की आवश्यकता होती है। मेरे सामने अध्यापक पद की पेशकश की गई और अक्टूबर 2021 की शुरुआत में मेरे रोजगार को अंतिम रूप दिया गया। और ईश्वर की कृपा से पूर्व कॉलेज में मैं जितना वेतन पाती थी, उसकी तुलना में मुझे अधिक वेतन दिया गया। ईश्वर की स्तुति हो!

आज, जब लोग पूछते हैं कि मैंने हाई स्कूल में पढ़ाने के लिए कॉलेज क्यों छोड़ा, तो मैं बताती हूं कि मेरे ईश्वर मेरे लिए कितने अद्भुत हैं। यहां तक ​​कि अगर मेरा नया पद, कम वेतन के साथ एक छोटी नौकरी होती, तो भी मैं इसे अपने प्रभु येशु के लिए खुशी से स्वीकार करती। जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं, तो मुझे एहसास होता है कि सांसारिक पद, उपाधि और खिताब मायने नहीं रखते। हम शाश्वत मुकुट को जीतें यही मायने रखता है। इब्रानियों के नाम पत्र कहता है, “आओ… हमारे अगुआ और विश्वास के प्रवर्तक येशु पर अपनी दृष्टि लगाकर, धैर्य के साथ उस दौड़ में आगे बढ़ते जाएँ, जिसमें हमारा नाम लिखा गया है” (12:1ब-2)।

मैं अपनी गवाही को आनंद के साथ साझा करती हूं, अपने पिछले नियुक्तिकर्ता को बदनाम करने के लिए नहीं, या यह शेखी बघारने के लिए भी नहीं कि ईश्वर ने मुझे आशीर्वाद दिया है क्योंकि मैं कितनी प्रार्थनापूर्ण रही हूं। ऐसा बिलकुल मेरा उद्देश नहीं है। मेरा उद्देश्य मेरे विश्वास को साझा करना है कि जब हम प्रभु के लिए एक कदम उठाएंगे, तो वह हमारे लिए सौ कदम उठाएगा। यदि कभी भी आप परमेश्वर की आज्ञाओं से समझौता करने के लिए बाध्य किये जाते हैं, लेकिन आपको डर है कि आप के ना कहने से आप और आपके परिवार पर नकारात्मक वित्तीय परिणाम होगा,  मेरे प्यारे भाई या बहन, मैं सिफारिश करने का साहस करूंगी, कि आप प्रभु की खातिर वित्तीय अंधेरे में कूदने का जोखिम उठावें … और उसकी दया पर भरोसा करें।

संतों का अनुभव, और मेरा अपना विनम्र अनुभव, मुझे विश्वास दिलाता है कि हमारा ईश्वर हमें कभी नहीं छोड़ता।

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By: Suja Vithayathil

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नवम्बर 24, 2022
Evangelize नवम्बर 24, 2022

उस प्यार का अनुभव करें जिसका आपने हमेशा सपना देखा था

येशु मसीह के कई और विभिन्न प्रकार के चित्र उपलब्ध हैं। पवित्र ह्रदय की तस्वीर मेरे मन को दुखी करती है, साथ साथ मेरे अन्दर बहुत आशा भी जगाती है। इस काफी प्रचलित चित्र में, येशु अपने लबादे को हटा रहे हैं, ताकि आग का शोला उगलता हुआ, छेदा हुआ और कांटों के मुकुट से घिरा हुआ अपने दिल को वह हमें दिखा सकें। यदि हम इसकी सही समझ नहीं रखते हैं, तो हम इसे पराजय का संकेत मानने की भूल करेंगे। शायद कोई गलती से यह भी सोच सकता है कि येशु दर्द और पीड़ा का महिमा मंडन कर रहे हैं।

बीमारी की पीड़ा भोगनेवाले ऐसे व्यक्ति होने के नाते, मैं उस पीड़ादायक तस्वीर को, सांत्वना देने वाली तस्वीर के रूप में पहचानती हूं। कई बार, जब भौतिक दुनिया में, कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं था, जो मेरे अकेलापन और पीड़ा की गहराई में, मुझे शांत कर सकता था। मेरी मदद करने के अच्छे इरादे रखने वाले लोग भी मुझे सांत्वना नहीं दे पाते थे। ऐसे में मैं हमेशा क्रूस के चरणों पर और येशु के उस छिदे हुए हृदय में साहस और सांत्वना पाती थी। येशु मुझे जानता था। वह उस स्थान पर मुझसे मिलने के लिए हर वक्त उपलब्ध था।

येशु ने संत मार्गरेट अलकोक को दर्शन दिए और उससे कहा, “मानव जाति से तीव्र प्रेम करने वाला मेरा हृदय, अब उसकी दयालुता की लपटों को समाहित नहीं कर सकता है; उसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपने ह्रदय को लोगों पर प्रकट करें, ताकि वे उसमें निहित निधि से समृद्ध हों।”

क्या अभी भी संदेह है?

मसीह के प्रेम का हृदय हमारे लिए इतनी गहराई से और उदारता से जल रहा है कि वह स्वयं को समा नहीं सकता। वह अपने पवित्र हृदय के खजाने को साझा करते हुए मानव जाति पर अपने अति उदार, अथाह प्रेम को उंडेलना चाहता है।

तो हमें किस बात का डर है? शुद्ध, निःस्वार्थ, अथाह प्रेम से? सबसे उदार इस उपहार को स्वीकार करने में हमें कौन रोक रहा है?

मानव को इस प्रेम से कौन वंचित रखता है? और वह प्यार हमें समाहित कर लें, तो इस पर हम क्यों अनिच्छुक हैं और किस बात का हमें डर है? कभी-कभी, मैं उस स्तर के उदार, और हृदय विशाल प्रेम के लिए अपने आप को अयोग्य महसूस करती हूँ। क्या यह प्यार मेरे जैसे लोगों के लिए भी मुफ़्त में उपलब्ध है?

परमेश्वर के हृदय को प्यार ही दिशा निर्देश देता है। परमेश्वर प्रेम है! शायद हमारी विकृत समझ, और प्यार का विकृत अनुभव ही हमें सबसे ज्यादा डराते हैं। हो सकता है कि पूर्व में हमारे साथ ठीक से प्यार किये जाने के बजाय, हमें इस्तेमाल किया गया हो। हो सकता है कि अतीत में हमें किसी ऐसे व्यक्ति ने प्यार दिखाया हो, जो हमारे निकट थे, जो प्यार हमारे लिये नाप तौल करके दिया गया था, हमसे वह प्यार जबरन लिया गया, या शर्तों के आधार पर हमसे प्यार किया गया। जब उनका पेट भर गया या वे ऊब गए, तो उन्होंने हमें त्याग दिया और कुछ अन्य चीज़ों या दिलचस्प व्यक्ति की ओर वे बढ़ गए।

हमारा मूल परिवार कैसा था? क्या वह बिखरा हुआ था या निष्क्रिय था? हमारा पहला घर “प्यार की पाठशाला” रहा होगा, जहां हमें प्यार के बारे में जीवन केलिए उपयोगी कई मूल्यवान शिक्षा दी जाती थी, जहां गलती करने और उन गलतियों से सीखने के लिए हमें आज़ादी मिलती थी। अफसोस की बात है कि कुछ लोगों के लिए उनका परिवार शायद विश्वासघात, दर्द और दुर्व्यवहार के स्थान रहे होंगे। आपको अकेलापन और चोट के उस स्थान पर रहने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आप पवित्र हृदय की ओर कदम बढायें।

उन्नीसवीं सदी के फ्रांसीसी सन्यासी और आध्यात्मिक लेखक, फादर बर्लियो, प्रभु ख्रीस्त के बारे में यह लिखते हैं, “यह प्रेम ही था जिसके कारण उसने इस धरती पर जन्म लिया, कार्य किया, पीड़ा भोगी, और रोया; यह प्रेम ही था, जिसने आखिरकार उसे मरने के लिए मजबूर कर दिया। और यह प्रेम ही है जो युखरिस्त अर्थात पवित्र संस्कार में, स्वयं को हमें देने के लिए, हमारा अतिथि बनने, हमारा साथी बनने, हमारा उद्धारकर्ता बनने, हमारा भोजन बनने और हमारा पोषण बनने केलिए, उसे प्रेरित करता है।”

प्रेम का रसातल

मसीह जो कुछ भी करता है और कहता है, वह प्रेम के कारण ही करता है! यदि वह हमसे कोई भी चीज़ माँगता है, जो अंततः हमारे अपने लाभ के लिए है, तो उस से डरने की ज़रूरत नहीं है। मेरे अपने जीवन में मैं ने जब प्रत्येक भारी क्रूस का सामना किया, तब मैंने शुरू में सोचा था कि उन्हें संभालने की क्षमता मुझ में बिलकुल नहीं होगी। यह सच है कि मेरी क्षमता उतनी ही थी। संत पौलुस कहते हैं, “… ख्रीस्त के प्रति, हम मजबूत हैं” (2 कुरिन्थी 12:10)। जब हम यह विश्वास करने के भ्रम में रहते हैं कि हमारे पास सब कुछ है, तब हमें आगे ले जाने और संपोषित रखने के लिए वहाँ मसीह के पास कोई स्थान नहीं रह जाता ।

यदि आपके अतीत ने आपको केवल नकली प्रेम के विकृत रूप दिखाए हैं, यदि आपकी वर्तमान स्थिति “दूसरे की भलाई के लिए निस्वार्थ दान” का सबसे अच्छा प्रदर्शन नहीं है, तो मैं आपको दृढ़ता के साथ सिफारिश कर सकती हूं कि आप के अन्दर की जो भी कमी हैं, उसे भरने के लिए आप येशु के सच्चे ह्रदय से प्यार करें। येशु के अति पवित्र हृदय से ही आप सीखेंगे कि वास्तविक प्यार कैसे देना और कैसे प्राप्त करना है।

अंत में, संत जेत्रूद, जिन्हें येशु के साथ अंतरंग मिलन का आनंद प्राप्त था, इन शब्दों में अपनी बात रखती हैं, “हे अनंत दयालुता के महान रहस्य और प्रेम के रसातल, यदि लोग जानते कि तू उनसे कितना प्यार करता है, यदि तू उन्हें अपने दिल की अनंत खजाने की खोज करने की अनुमति उन्हें देता, तो वे सभी तेरे चरणों में गिर जाते, और केवल तुझसे प्यार करते … ।”

इसलिए हर इंसान के दिल से यह सवाल पूछा जाता है; क्या आप पृथ्वी पर अपने सीमित दिनों को नकली प्यार को स्वीकार करते हुए, अतीत के दुखों में डूबते हुए, और अपने दिल को नए सिरे से और अधिक दुर्व्यवहार के लिए उजागर करना जारी रखेंगे? या, क्या आप “अनंत दयालुता के रहस्य और प्रेम के रसातल” की शरण की ओर भागेंगे?

हमेशा की तरह, हमारे प्रेमी परमेश्वर इस निर्णय को लेने की छूट हम पर छोड़ देता है, और हमारी अनुमति प्राप्त किये बिना अपने प्रेम के इस अद्भुत उपहार को वह हम पर नहीं थोपेगा। तो क्या यह अनुमति उन्हें देने के लिए आप तैयार हैं?

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By: बारबरा लिश्को

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जून 03, 2022
Evangelize जून 03, 2022

1950 के दशक में, कैथलिक श्रमिक आन्दोलन  (कैथलिक वर्कर मूवमेंट) की सह-संस्थापिका, डोरोथी डे ने एक ऐसे दृष्टिकोण को स्पष्ट करना शुरू किया, जिसे द्वितीय वेटिकन अधिवेशन में बड़े पैमाने पर अनुमोदित किया गया था। उन्होंने कहा कि लोक धर्मियों के लिए “आज्ञाओं की आध्यात्मिकता” और पुरोहित (पादरी) वर्ग के लिए “सलाह- आध्यात्मिकता” की प्रचलित धारणा अव्यवहारिक थी। वे उस समय के मानक दृष्टिकोण का उल्लेख कर रही थी कि लोकधर्मी दस आज्ञाओं का पालन के न्यूनतम कार्य निभाने लिए बुलाया गए थे – यानी लोकधर्मियों को प्रेम और न्याय के विरुद्ध सबसे बुनियादी बातों के उल्लंघनों से परहेज करना होगा। जबकि पुरोहित और धर्मसंघी लोग निर्धनता, ब्रह्मचर्य और आज्ञाकारिता के सुसमाचारी प्रतिज्ञाओं का पालन करने के एक वीर जीवन जीने केलिए बुलाया गए थे। लोक धर्मी साधारण खिलाड़ी थे, और पुरोहित वर्ग आध्यात्मिक एथलीट वर्ग था। इस तरह की सोच और समझ के विरुद्ध  डोरोथी डे ने काफी जोरदार शब्दों में विरोध किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रत्येक बपतिस्मा प्राप्त व्यक्ति, वीर पवित्रता के लिए बुलाया गया था – जिसका अर्थ है, आज्ञाओं और सुसमाचारी प्रतिज्ञाओं दोनों बातों का पालन।

जैसा कि मैं कहता हूं, पवित्रता के लिए सार्वभौमिक आह्वान पर अपने सिद्धांत में, द्वितीय वेटिकन अधिवेशन  ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। यद्यपि वैटिकन परिषद् में उपस्थित आचार्यों ने सिखाया कि जिस तरह से पुरोहित और लोक धर्मी निर्धनता, ब्रह्मचर्य और आज्ञाकारिता के सुसमाचारी प्रतिज्ञाओं को अपने अपने जीवन में व्यवहार में लाते हैं, उसमें काफी अंतर है, परिषद् के आचार्यों ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि मसीह के सभी अनुयायियों को उन आदर्शों को अपने जीवन में व्यवहार में ला करके वास्तविक पवित्रता की तलाश करना चाहिए। तो, यह कैसे होगा? आइए पहले निर्धनता को लें। हालांकि, आम तौर पर, जिस तरह एक ट्रैपिस्ट मठवासी कठोर निर्धनता का जीवन जीता है, उसी प्रकार की निर्धनता के लिए लोक धर्मी नहीं बुलाया जाता है। जिस प्रकार लोकधर्मियों को संसार में उनके अपने मिशन के लिए एक बुलावा हैं, उस हिसाब से उन्हें दुनिया की वस्तुओं से अनासक्ति या अपरिग्रह का अभ्यास करना चाहिए। जब तक एक साधारण व्यक्ति धन, शक्ति, सुख, पद, सम्मान आदि की लत से आंतरिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं करता, तब तक जिस प्रकार उसे ईश्वर की इच्छा का पालन करना चाहिए, उस प्रकार वह नहीं कर सकता। जब सामरी स्त्री ने अपना पानी का घडा कुएं पर छोड़ दिया, केवल जब उसने दुनिया के सुखों के पानी से अपनी प्यास बुझाने की कोशिश करना बंद कर दिया, तभी वह सुसंचार का प्रचार करने में सक्षम बनी। (योहन 4)। इसी तरह, जब एक बपतिस्मा प्राप्त व्यक्ति आज खुद को धन, अधिकार, या स्वार्थपूर्ण भावनाओं की लत से मुक्त करता है, तभी वह ईश्वर की इच्छा के अनुरूप संत बनने के लिए सक्षम होता है। तो, वैराग्य या अपरिग्रह के अर्थ में, लोक धर्मियों की पवित्रता के लिए निर्धनता आवश्यक है।

सुसमाचारी परामर्शों में से दूसरा, शुद्धता भी लोक धर्मी आध्यात्मिकता के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि जिस तरह से पुरोहित और धर्मसंघी शुद्धता को ब्रह्मचारी के रूप में जीते हैं, उनके लिए यह विशेष है, लेकिन इस का पुण्य या इसकी धार्मिकता अपने में लोक धर्मियों के लिए भी लागू होता है। शुद्धता का सीधा सा मतलब है यौन संबंधों में विश्वस्तता या सही ढंग से व्यवस्थित यौन जीवन। और इसका अर्थ है किसी के यौन जीवन को प्रेम के तत्वावधान में लाना। जैसा कि थॉमस एक्विनास ने सिखाया है कि प्रेम एक भावना या भावुकता नहीं है, बल्कि व्यक्ति का आग्रह, संकल्प या इच्छा का कार्य है, अधिक सटीक शब्दों में कहें तो, प्रेम दूसरे की भलाई के लिए एक संकल्प है। यह आह्लाद या उल्लास में भाव विभोर होने का आनंदपूर्ण कार्य है जिसके द्वारा हम उस अहम् की भावना से मुक्त हो जाते हैं, जिस अहम् का गुरुत्वाकर्षण खिंचाव हर चीज को अपनी ओर खींचना चाहता है। खाने-पीने की सहज प्रवृत्ति या इच्छा की तरह, सेक्स भी जीवन से जुड़ा एक जुनून है। यही वजह है कि सेक्स का यह जूनून इतना शक्तिशाली है और इसलिए आध्यात्मिक रूप से इतना खतरनाक भी है, जो सब कुछ और हर किसी को अपने नियंत्रण में लेने के लिए उत्तरदायी है। ध्यान दें कि सेक्स रुपी इस नकारात्मक प्रवृत्ति को रोकने के लिए ही कलीसिया यह शिक्षा देती है कि सेक्स का संबंध सिर्फ विवाह के संदर्भ में ही है। हमारी कामुकता को वैवाहिक एकत्व (जीवनसाथी के प्रति अनन्य या आत्यंतिक निष्ठा) और प्रजनन (उसी समान बच्चों के प्रति आत्यंतिक निष्ठा) के अधीन होना चाहिए। ऐसा कहते हुए कलीसिया हमारे यौन जीवन को पूरी तरह से प्यार की छत्रछाया में लाने का प्रयास करती है। अव्यवस्थित यौन जीवन एक व्यक्ति के भीतर गहरी अस्थिर करने वाली शक्ति बन जाती है, जो समय के साथ, उसके प्रेम करने की क्षमता को नष्ट कर देती है।

अंत में, लोक धर्मी लोगों को आज्ञाकारिता का अभ्यास करने की बुलाहट मिली हैं। यह भी धर्मसंघी तरीके से नहीं, बल्कि विशिष्ट तरीके से लोक धर्मी दशा के लिए। यह अपने स्वयं के अहं की आवाज सुनने के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के परम स्वर को सुनने के लिए, अर्थात पवित्र आत्मा के अनुबोधनों और प्रेरणाओं को (लातीनी भाषा में ओबेदिरे) सुनने के लिए और उसका पालन करने की इच्छाशक्ति है। हान्स उर्स वॉन बलथसार द्वारा लिखित, निर्मित, निर्देशित और स्वयं अभिनीत स्वार्थ लीला (अहं-नाटक) और ईश्वर द्वारा लिखित, निर्मित और निर्देशित ईश लीला (थियो-ड्रामा) के बीच के अंतर के बारे में मैं ने अक्सर बात की है। हम कह सकते हैं कि आध्यात्मिक जीवन का संपूर्ण उद्देश्य स्वार्थ लीला (अहम् नाटक) से मुक्त होना है ताकि ईश लीला को गले लगाया जा सके। हम में से अधिकांश लोग जो पापी हैं, अधिकांश समय, अपने स्वयं की धन दौलत, सफलता, जीविका की योजनाओं और व्यक्तिगत सुख में व्यस्त रहते हैं। परमेश्वर की आज्ञा मानने का अर्थ है उन आत्मघातक चिंताओं से बाहर निकलना और चरवाहे की आवाज सुनना।

कल्पना कीजिए कि यदि, रातोंरात, प्रत्येक कैथलिक व्यक्ति दुनिया की धन दौलत से आत्यंतिक वैराग्य या अपरिग्रह की भावना के साथ रहना शुरू कर दे तो क्या होगा? कैसे राजनीति, अर्थशास्त्र और संस्कृति नाटकीय रूप से इस दुनिया की बेहतरी और अच्छाई के लिए बदल जाएगी। कल्पना कीजिए कि यदि, आज, प्रत्येक कैथलिक पवित्रता से जीने का संकल्प करे तो यह कैसा होगा? हम अश्लील यौन साहित्य और दृश्य श्रव्य सामग्री (पोर्नोग्राफ़ी) के व्यवसाय में भारी सेंध लगा पायेंगे; मानव तस्करी नाटकीय रूप से कम हो जाएगी; परिवारों को काफी सार्थक रूप से मजबूत किया जाएगा; गर्भपात में काफी कमी आएगी। और कल्पना करें कि यदि, अभी, प्रत्येक कैथलिक ने परमेश्वर की वाणी के आज्ञाकारिता में जीने का निर्णय लिया है तो कैसा होगा? आत्म-चिंता और आशंका के कारण होने वाले कष्ट कितने कम होंगे!

इस लेख में मैं जो बात बता रहा हूं, वह एक बार फिर, महान द्वितीय वैटिकन परिषद् द्वारा दी गयी पवित्रता के लिए सार्वभौमिक आह्वान पर शिक्षा का हिस्सा है। परिषद् के आचार्यों ने सिखाया कि पुरोहित और बिशप का मतलब है कि लोक धर्मियों को शिक्षा  देने  और पवित्र करने के लिए हैं। बदले में, लोक धर्मियों की बुलाहट दुनियावी व्यवस्था को पवित्र करने के लिए हैं और राजनीति, वित्त, मनोरंजन, व्यवसाय, शिक्षण, पत्रकारिता आदि में ख्रीस्त को लाना है। और जब निर्धनता, शुद्धता और आज्ञा पालन की सुसमचारी प्रतिज्ञाओं को अपनाने से वे इसमें कामयाब होते हैं।


© यह लेख मूल रूप से wordonfire.org पर प्रकाशित किया गया था। अनुमति के साथ पुनर्मुद्रित।

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By: बिशप रॉबर्ट बैरन

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जून 03, 2022
Evangelize जून 03, 2022

कड़ी मेहनत करने और प्रार्थना करने की सीख

जब मैंने पिछले साल अपनी 10-वीं कक्षा में जीव विज्ञान के लिए साइन-अप किया था, तो मैंने कभी नहीं सोचा था कि जीव विज्ञान मेरे लिए मुश्किल होगी। पहले दिन, मुझे आत्मविश्वास और स्वयं पर भरोसा महसूस हुआ। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मैं पिछड़ने लगी। जबकि मेरे साथियों ने सवालों के जवाब दिए और प्रत्ययों को आत्मविश्वास से रट रट कर सुनाया, तब मैं भ्रमित और हतप्रभ महसूस कर रही थी। दिन-ब-दिन, मैं मुस्कुराती रही, अपना सिर हिलाती रही, और नाटक करती रही कि मुझे पता है कि क्या चल रहा है, क्या होना है।

जीव विज्ञान की पहली परीक्षा से एक रात पहले, मैंने बमुश्किल पढ़ाई की थी। मैंने कुछ शब्दावली को देखा और कुछ परिभाषाओं को याद करने का प्रयास किया। जब मैंने प्रश्न पत्र में पहला प्रश्न देखा तो मेरा सिर चकराने लगा। प्रश्न लंबे थे, एक एक पैराग्राफ की तरह, और उन्हें बार-बार पढ़ने के बावजूद मैं समझ नहीं पायी!

अगले दिन, मुझे अपना उत्तर पुस्तिका वापस मिल गयी। और उसमें मेरे लिए दिए गए 53% अंक देखकर मैं हैरान नहीं थी। लेकिन कुछ निराशा तो ज़रूर हुई, क्योंकि मेरे कई सहपाठियों ने बेहतर अंक प्राप्त किए थे। जब मैंने अपना ग्रेड ऑनलाइन चेक किया, तो मैंने देखा कि मेरे समग्र ग्रेड को “सी” तक कम कर दिया गया था। मुझे नहीं पता था कि अब क्या करना है।

जैसे-जैसे महीने बीत गए और अन्य परीक्षाएं भी बीत गयीं, मेरे ग्रेड में उतार-चढ़ाव होता रहा। मेरी माँ ने मुझे सबसे अच्छी सलाह दी: अधिक प्रार्थना करो और परमेश्वर की सहायता लो। तब से, हर परीक्षा देने से पहले, मैंने पवित्र आत्मा का आह्वान करना शुरू किया और मुझे लगा कि परमेश्वर सचमुच मेरी मदद कर रहा है। मुझे पता था कि मैं अकेली नहीं थी। मेरे टेस्ट स्कोर तेजी से बढ़ने लगे। मैंने अधिक समय प्रार्थना में बिताया। जैसे-जैसे मैं परमेश्वर से प्रेम करने और उस पर भरोसा करने में और गहरा होती गयी, सभी ने मुझमें एक आमूलचूल परिवर्तन देखा।

अगले सत्र परीक्षा देने से पहले, मैंने महीनों के अध्ययन, प्रार्थना और परीक्षा की तैयारी में बिताया। यह जानते हुए कि इस साल की परीक्षा कोविड-19 के कारण ऑनलाइन होगी, मैं घबरा गयी थी। परीक्षा का दिन आ गया और मेरे होठों पर एक ही आकांक्षा थी। “तुम्हें सफलता देनेवाला मैं तुम्हारा प्रभु हूं।”

जैसे ही मैंने परीक्षा शुरू की और डेटा, ग्राफ़ और बहुत सारे शब्दों से भरपूर प्रश्नों को देखा, मैं निराशा का अनुभव कर रही थी और कम समय के बारे में अत्यधिक चिंतित हो रही थी। हालाँकि, मैं किसी तरह मेहनत करती रही। अंत में मुझे लगा कि मैंने ठीक किया। महीने बीत गए। जिस दिन परिणाम ऑनलाइन पोस्ट किए गए, मेरा भाई सबसे पहले उठा, मेरे अकाउंट में साइन इन किया और और मेरे स्कोर की जाँच की। फिर उसने इस बारे में मेरी माँ और पिताजी को बताया। मैंने अपने परिवार से कहा था कि जब तक मैं उनसे नहीं पूछूंगी, तब तक मुझे मेरा अंक न बताएं।

घंटों बाद, खुद को नियंत्रित करने में असमर्थ होकर, मैंने अपने भाई को मेरा स्कोर बताने केलिए कहा। जब उसने कहा कि मैंने जीव विज्ञान परीक्षा में “4” स्कोर प्राप्त किया है, तब मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। मेरा एक सहपाठी, जिसका कक्षा में सबसे अच्छा ग्रेड था और जिसे उच्चतम अंक प्राप्त करने की उम्मीद थी, उसने मुझसे कम अंक प्राप्त किए। यह कैसे हुआ?

मुझे पता है कि यह मेरी अपनी योग्यता के कारण नहीं था और मैं अपने जीवन में इस आशीर्वाद के लिए हमेशा ईश्वर की आभारी रहूंगी। बेशक, मैंने कड़ी मेहनत करने और सभी आवश्यक अध्ययन करने के महत्व को सीखा है। लेकिन मैंने परमेश्वर पर भरोसा रखने का महत्व भी सीखा है। मुझे विश्वास है कि मेरे जीवन में ईश्वर हमेशा मेरे साथ रहेगा, चाहे मैं कितनी भी बाधाओं का सामना करूं।

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By: Rosemaria Thomas

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