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अपने आराम क्षेत्र से बाहर निकलना कभी भी आसान काम नहीं होता, तो फिर क्यों परेशानी उठानी है?
जीवन के किसी मोड़ पर, येशु हम सभी से पूछते हैं: “क्या तुम मेरे राज्य के लिए बाहर निकलने को तैयार हो?” इसके लिए कोई योग्यता की ज़रुरत नहीं है; कोई नौकरी का विवरण नहीं, कोई बायोडाटा स्क्रीनिंग नहीं… यह एक सरल हाँ या नहीं वाला प्रश्न है। जब मुझे यह बुलावा मिला, तो मेरे पास उसे देने के लिए कुछ भी नहीं था। मैंने जब अपने सेवा क्षेत्र में प्रवेश किया, तब किसी प्रकार का लाभ पाने की मेरी कोई इच्छा नहीं थी। समय ने साबित कर दिया कि येशु के लिए एक इच्छुक और प्रेमपूर्ण हृदय ही वह सब था जिसकी मुझे आवश्यकता थी। उसने बाकी सब संभाल लिया। एक बार जब आप हाँ कहते हैं, तो आप अपने आप में बदलाव देख सकते हैं! जीवन अधिक सार्थक, आनंदमय और रोमांचकारी हो जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि दुख कभी मौजूद नहीं होगा।
“जब येशु के लिए इस संसार को छोड़कर अपने पिता के पास लौटने का समय निकट था, तो उसने अपने शिष्यों के पैर धोए। उसने पेत्रुस से कहा: ‘यदि मैं तुम्हारे पैर न धोऊँगा, तो तुम्हारा मेरे साथ कोई सम्बन्ध नहीं रह जाएगा।'” उसने आगे कहा: “इसलिए यदि मैं – तुम्हारे प्रभु और गुरु – ने तुम्हारे पैर धोए हैं, तो तुम्हें भी एक दूसरे के पैर धोने चाहिए।” (योहन 13:14) एक तरह से, येशु पूछ रहे हैं: “क्या तुम भीगने के लिए तैयार हो?” पेत्रुस की तरह, हम स्वाभाविक रूप से सूखे और आरामदायक रहना पसंद करते हैं, लेकिन वह हमें अपने प्यार और अनुग्रह के जल में भीगने के लिए बुला रहा है। सबसे खूबसूरत बात यह है कि वह हमें अपने लिए नहीं बुला रहा है… जब येशु अपने शिष्यों के पैर धोने के लिए नीचे झुका, तो न केवल उसके शिष्य भीग गए, बल्कि इस प्रक्रिया में येशु के हाथ भी गीले और गंदे हो गए। जब हम मसीह के पदचिन्हों पर चलते हैं, तो उसके नाम पर दूसरों की सेवा करते हुए, हम भी उस बोझ और दर्द का हिस्सा बनेंगे जिससे दूसरा व्यक्ति गुज़र रहा है। पवित्र बाइबिल हमें निर्देश देती है: “भारी बोझ धोने में एक दूसरे की सहायता करें, और इस प्रकार तुम मसीह की विधि पूरी करें।” (गलाती 6:2)
येशु के रूपान्तरण के बाद, पेत्रुस ने कहा: “प्रभु, यहाँ होना हमारे लिए कितना अच्छा है; आप चाहें, तो मैं यहाँ तीन तम्बू खड़ा कर दूंगा – एक आपके लिए, एक मूसा, और एक एलियस के लिए।” (मत्ती 17:4) ऐसा लगता है कि हम कई मायनों में पेत्रुस के जैसे हैं। तंबू लगाना और उस आरामदायक क्षेत्र में रहना हम पसंद करते हैं, चाहे वह हमारा गिरजाघर हो, घर हो या कार्यस्थल। सौभाग्य से, हमारे लिए पवित्र बाइबिल हमें ऐसे कई योग्य उदाहरण प्रदान करती है जिनसे हम सीख सकते हैं।
होना या न होना
हमारे पल्ली पुरोहित श्रद्धेय क्रिस्टोफर स्मिथ ने एक बार इस बात पर मनन किया कि कैसे योहन बपतिस्ता ने अपने आराम क्षेत्र जंगल को छोड़ दिया और मसीहा के आने की घोषणा करने के लिए शहर में आया। मूसा मिस्र से भाग गया और अपने ससुर के साथ अपने लिए एक तम्बू बनाया लेकिन परमेश्वर ने उसे बाहर निकाला और उसे एक मिशन सौंपा। उसे उसी मिस्र में वापस लाया गया जहाँ से वह भागा था, और परमेश्वर ने उसे अपने लोगों को बचाने के लिए शक्तिशाली रूप से इस्तेमाल किया। एलियस ईज़ेबेल से भाग गया और एक झाड़ी के नीचे शरण ली (1 राजा 19:4), लेकिन परमेश्वर ने उसे अपने लोगों के लिए अपनी योजना को स्थापित करने के लिए वापस लाया। अब्राहम को अपने रिश्तेदारों को छोड़ना पड़ा और यात्रा करनी पड़ी जहाँ परमेश्वर उसे ले गया, लेकिन उस राज्य को देखें जो परमेश्वर में अब्राहम के भरोसे के कारण विकसित हुआ!
अगर मूसा घर पर रहता, तो इस्राएलियों का क्या हश्र होता? और अगर एलियस डर के मारे पीछे हट जाता और वापस आने से इनकार कर देता तो क्या होता? पेत्रुस को देखें, जिसने समुद्र में उग्र लहरों पर अपने पैर रखने के लिए नाव से विश्वास की छलांग लगाई। वह बिलकुल अकेला था, डूबने का डर उसके मन में था, लेकिन येशु ने उसे डगमगाने नहीं दिया। बाहर निकलने की उसकी इच्छा ने एक अविस्मरणीय चमत्कार की शुरुआत की, जिसका आनंद नाव के अंदर मौजूद अन्य डर से भरे शिष्यों में से कोई भी नहीं ले सका, क्योंकि उन्होंने अपने आराम के क्षेत्र से बाहर निकलने से इनकार कर दिया था।
और इसी तरह, हमारे जीवन में भी, अपने तंबू से बाहर निकलने का पहला कदम उठाने केलिए परमेश्वर हमारा इंतज़ार कर रहा है। जब पवित्र आत्मा ने मुझे लेखन के माध्यम से सुसमाचार प्रचार करने के लिए प्रेरित किया, तो मेरे लिए पहले इसे हाँ कहना बहुत मुश्किल था। मैं स्वभाव से डरपोक और शर्मीली हूँ, और जैसे पेत्रुस लहरों को देखता था, वैसे ही मैं केवल अपनी अक्षमताओं को देखती थी। लेकिन जब मैंने खुद को परमेश्वर की इच्छा के आगे समर्पित कर दिया और उस पर भरोसा करना शुरू कर दिया, तो उसने मुझे अपनी महिमा के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
आइए हम अपने आराम क्षेत्र से बाहर निकलें और पवित्र आत्मा के अभिषेक में भीगें, क्योंकि यह जलती हुई झाड़ी की शक्तिशाली आग थी जिसने मूसा का अभिषेक किया था। याद रखें कि कैसे (एक मिस्री को मारकर!) इस्राएलियों को ‘बचाने’ का मूसा का पहला प्रयास उन इस्राएलियों के द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था? ऊपर से आने वाले आह्वान का धैर्यपूर्वक इंतज़ार करें, उसका अभिषेक प्राप्त करें, और उसके नाम का प्रचार करने के लिए दुनिया में जाएँ!
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लिडिया बोस्को एक कार्मेलाइट धर्म बहन हैं जो कैथलिक सेवा ‘अभिषेकाग्नि’ के माध्यम से प्रभु की सेवा करती हैं। वे अपने पति और तीन बच्चों के साथ दक्षिणी यू.एस.ए के दक्षिण कैरोलिना में रहती हैं।

दुख अब कड़वा नहीं रहा, यह अब कहीं अधिक मधुर हो गया है…
महामारी के चरम के दौरान, कोविड-19 से ग्रसित होकर, मैं गंभीर श्वसन रोग की शिकार हो गई और मुझे चार दिनों के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। मेरी फेफड़ों की स्थिति में सुधार के लिए मुझे नसों के माध्यम से दवाएं दी गईं। इस बीमारी ने मेरे फेफड़ों में निशान छोड़ दिए, इसलिए सूजन कम करने के लिए डॉक्टरों ने प्रेडनिसोन और ऑक्सीजन देकर मुझे घर भेज दिया।
इससे पहले, मैं एक सक्रिय वरिष्ठ नागरिक थी जो बागवानी, अपने कुत्ते के साथ सैर, रोजाना लिखने, पढ़ने, और अपने परिवार व दोस्तों के साथ समय बिताने का आनंद लेती थी। मैं मिस्सा और आराधना में जाती थी और नियोजित अभिभावकत्व दल में प्रार्थना करती थी। हालांकि, जीवन ने एक नई चुनौती का रूप ले लिया।
साइनस के कारण महीनों तक मुझे सिरदर्द की बीमारी बनी रही, और कोई भी दवा मुझे दर्द से राहत नहीं दिला सकी। मैं बहुत जल्दी थक जाती थी और दिन में कई बार लेटना पड़ता था। अक्सर, मैं घर के आसपास कुछ कामों को शुरू करती और जल्दी ही पूरी तरह से थक जाती और काम अधूरा रह जाता। मैंने स्वाद की क्षमता और यहां तक कि सुनने की क्षमता का कुछ हिस्सा भी खो दिया। कई बार मैं गाड़ी नहीं चला पाती थी क्योंकि ड्राइविंग के दौरान भ्रमित हो जाती थी और मुझे चक्कर आ जाता था। डॉक्टरों ने निर्धारित किया कि मैं दीर्घ कालीन कोविड से पीड़ित थी, और यह स्थिति कई महीनों तक बनी रही।
इसके अलावा, मेरा मन और सोचने की क्षमता धुंधली हो गई। मैं बहुत भूलने लगी — डॉक्टर इसे “ब्रेन फॉग” कहते थे। मैं पढ़ नहीं पाती थी, ध्यान केंद्रित करना असंभव हो गया था, और मैं बहुत चिंतित रहती थी। मैंने राहत के लिए प्रार्थना करना शुरू किया और दूसरों से भी मेरे लिए प्रार्थना करने को कहा। मैंने अपने दुख को उन लोगों के लिए समर्पित करने की कोशिश की जिन्हें ईश्वर की दया की जरूरत थी, लेकिन ऐसा करना बेहद कठिन था।
एक चेतावनी का संदेश
फिर मेरे मन में एक प्रेरणादायक विचार आया। मुझे पूरा यकीन है कि यह पवित्र आत्मा से प्रेरित था। मैंने फादर स्टू के बारे में सुना था, जो एक मुक्केबाज से कैथलिक पुरोहित बने थे। उन्होंने अपनी सशक्त जीवन की शुरुआत में इन्क्लूजन बॉडी मायोसाइटिस (IBM) नामक बीमारी का सामना किया, लेकिन वे पराजित नहीं हुए।
शराबी माता-पिता के घर में बिना किसी धार्मिक लालन पोषण के पले-बढ़े स्टीवर्ट लॉन्ग का बचपन क्रोध से भरा हुआ था। किशोरावस्था में, उन्होंने हर रात गलियों और सड़कों पर लड़ाई शुरू कर दी। जल्द ही उन्होंने मुक्केबाजी खेल को अपनाया, लेकिन जबड़े पर चोट लगने से उनका मुक्केबाजी करियर समाप्त हो गया। वयस्क होने पर, वे फिल्मों में किस्मत आजमाने के लिए कैलिफ़ोर्निया चले गए, लेकिन उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली। एक गंभीर दुर्घटना से बाल-बाल बचने और उनकी प्रेमिका के कैथलिक धर्म में परिवर्तन होने पर उन्हें एक आवश्यक चेतावनी प्राप्त हुई। जब उनका बपतिस्मा हो रहा था, तब उन्हें स्पष्ट रूप से महसूस हुआ कि वे पुरोहित बनने जा रहे हैं। कुछ वर्षों तक उन्होंने पवित्र आत्मा के संकेतों को नज़रअंदाज़ किया, लेकिन अंततः उन्होंने एक निर्णायक फैसला लिया और सेमिनरी में प्रवेश किया।
वहीं, सेमिनरी में, उन्हें इन्क्लूजन बॉडी मायोसाइटिस (IBM) की बीमारी होने का पता चला, जो मांसपेशियों के क्षय की बीमारी है और किसी भी चिकित्सा उपचार के प्रति प्रतिरोधी है। यह असाध्य बीमारी धीरे-धीरे अंगों की विफलता, निगलने और सांस लेने में कठिनाई, और अंततः मृत्यु की ओर ले जाती है। फादर स्टू ने अपने जीवन के अंतिम चार वर्ष एक ऐसे सुविधा केंद्र में बिताए जहां दीर्घकालिक देखभाल होती है। उनका कमरा, नंबर 227, ऐसा स्थान बन गया जहां लोग आत्मिक मार्गदर्शन और पाप स्वीकार के लिए, या सिर्फ उनके साथ फिल्में देखने के लिए आते थे। उनके कमरे में जाने के लिए प्रतीक्षा करने वालों की हमेशा कतार लगी रहती थी। उस सुविधा केंद्र में उनकी मिस्साओं में भाग लेने केलिए हमेशा भीड़ होती थी। उनके साथ मिस्सा करना एक अविश्वसनीय अनुभव था। फादर स्टू ने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक अनगिनत पीड़ित आत्माओं की सेवा की और अपना सारा कष्ट ईश्वर को अर्पित कर दिया। उनका निधन 9 जून, 2014 को हुआ।
फादर स्टू कहा करते थे: “क्रूस भरोसा करने का एक आह्वान है, भले ही सब कुछ भयानक रूप से गलत हो रहा हो।” तो, उनकी मध्यस्थता की प्रार्थना करते हुए, मैंने प्रार्थना करना शुरू किया: “फादर स्टू, अगर कोई जानता है कि कष्टों को सही तरीके से कैसे सहना है, तो वह आप ही हैं। कृपया मुझे दिखाएं कि कष्टों को कैसे सहना है।”
एक ही दिन में, फादर स्टू ने मेरी प्रार्थना का उत्तर दिया और मुझे दिखाया कि येशु के साथ मिलकर कैसे अच्छी तरह से कष्ट सहा जा सकता है। येशु मसीह की शांति ने अपनी शक्ति और दया के साथ मेरे पूरे अस्तित्व को भर दिया। इसे शब्दों में समझाना आज भी मेरे लिए कठिन है। मेरा कष्ट और दर्द हल्का और आसान हो गया। मैंने रोज़री माला और दिव्य करुणा माला की प्रार्थना करना शुरू किया और साथ ही, मैंने लिटर्जी ऑफ द आवर्स भी करना शुरू किया, जिसे मैंने पहले कभी नहीं किया था। मसीह की शांति ने मुझे इतना आनंद और सुकून दिया कि मैं अभिभूत हो गई। यह शांति लगभग एक महीने तक बनी रही — एक ऐसा महीना जो मेरे कष्टों के बीच दिव्य प्रेम से भरा हुआ, अत्यंत सुंदर था।
हाँ, मुझे लंबे समय तक कोविड के लक्षणों का सामना करना पड़ा, लेकिन कष्ट मधुर हो गया। हालाँकि मैं दैनिक मिस्सा में भाग लेने और यूखरिस्त ग्रहण करने में असमर्थ थी, मैंने हर दिन आध्यात्मिक रूप से परमप्रसाद ग्रहण किया। येशु ने कहा है: “मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगा और न ही त्यागूंगा।” मैं येशु के पास नहीं जा सकती थी, लेकिन येशु हर दिन मेरे पास आते थे।
और अधिक अनकही कहानियाँ
मैं फादर स्टू की मध्यस्थता के लिए बेहद आभारी हूं। उन्होंने वास्तव में मुझे दिखाया कि कैसे अपने छोटे और बड़े कष्टों को उन लोगों के लिए अर्पित किया जाए जिन्हें येशु की दया और चंगाई की आवश्यकता है। मेरे लिए, यह एक मार्मिक गवाही थी कि फादर स्टू का मिशन — अन्य पीड़ित आत्माओं की मदद करना — आज भी उनके स्वर्गीय घर से जारी है। यह कहानी उन कई चंगाई की कहानियों में से एक है जिसका बयान अब तक नहीं हुआ है।
फादर स्टू के साथ ही पुरोहिताई का अभिषेक प्राप्त करनेवाले फादर बार्ट टॉल्सन ने अपने भाई पुरोहित और मित्र के बारे में एक अत्यंत सरल और प्रभावशाली पुस्तक लिखी है जिसका शीर्षक है “दैट वाज़ फादर स्टू”। इस पुस्तक में फादर बार्ट ने लिखा है कि हमारे कष्टों में भी एक शाश्वत आशा है। फादर स्टू के जीवन की विरासत ने हॉलीवुड अभिनेता और निर्माता मार्क वॉलबर्ग को भी प्रेरित किया, जिन्होंने अप्रैल 2022 में “फादर स्टू” नामक एक फिल्म बनाई। मार्क वॉलबर्ग कहते हैं: “फादर बार्ट की पुस्तक वहां से शुरू होती है जहां फादर स्टू ने छोड़ा था। हम ईश्वर की दया में यह महसूस करते हैं कि फादर स्टू अब भी हमारी निगरानी और देखभाल कर रहे हैं।”
जब कष्ट असहनीय हो जाए, तो यह न भूलें कि हमारे पास स्वर्गीय सहायक हमेशा मदद के लिए तैयार हैं।
अपनी फिल्म “फादर स्टू” के निर्माण के अनुभव को साझा करते हुए मार्क वॉलबर्ग को शालोम वर्ल्ड के “बियॉन्ड द विज़न” में देखें और सुनें: shalomworld.org/episode/father-stu
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कॉनी बेकमैन कैथलिक राइटर्स गिल्ड की सदस्य हैं, जो अपने लेखन के माध्यम से ईश्वर के प्रति अपने प्रेम को साझा करती हैं और अपनी कैथलिक आस्था साझा करके आध्यात्मिक विकास को प्रोत्साहित करती हैं।
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एक सच्चा मसीही कभी भी अन्याय या द्वेष के प्रति आंख मूँद नहीं सकता।
रिंगो स्टार ने एक बार गाया था:
“अगर आपको गमगीन गीत गाने हैं,
तो अपनी कीमत चुकानी होगी
और आप जानते हैं, यह आसान नहीं होता।”
यदि हम येशु के मार्ग का अनुसरण करने जा रहे हैं, तो हमें इसके कठिन और अक्सर चुनौतीपूर्ण परिणामों को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना होगा।
चुनाव और परिणाम
येशु ने पहले ही भविष्यवाणी की थी कि उनके शिष्यों को कोड़े मारे जाएंगे, राज्यपालों के सामने उन्हें घसीटा जाएगा, परिषदों को सौंपा जाएगा, एक नगर से दूसरे नगर भागने पर मजबूर किया जाएगा, समाज से बहिष्कृत किया जाएगा और उनसे नफरत की जाएगी — सिर्फ इसलिए क्योंकि वे उनसे जुड़े हुए हैं। तो फिर उन्हें उत्पीडन पर आश्चर्य क्यों होना चाहिए? आखिरकार, येशु के साथ भी यही सब किया गया था। येशु का क्रूस उनके अनुयायियों का भी क्रूस होगा। सताव अपरिहार्य है। जैसा कि किसी ने कहा था: “अगर आप येशु का अनुसरण करने जा रहे हैं, तो आप जंगल का जीवन जीने के लिए तैयार रहिए।”
क्यों? साधारण शब्दों में, एक मसीही — जो बलिदानी और आत्म-त्यागपूर्ण प्रेम का चिन्ह है, और जो न्याय और शांति को बढ़ावा देता है — हमारे समाज की प्रचलित चेतना और मूल्यों को सवालों के घेरे में लाता है। इस दुनिया के झूठे साम्राज्य का आधार इस भ्रामक विचार पर खडा है कि कोई व्यक्ति सांसारिक वस्तुओं को प्राप्त करके खुश हो सकता है; इसलिए हम धन, प्रतिष्ठा और प्रशंसा, नियंत्रण और हेरफेर, और भोगवादी सुख के प्रतिमानों का पीछा करते हैं। हमारे समाज में इसे अत्यधिक उपभोक्तावाद, राष्ट्रवाद, स्वायत्त व्यक्तिवाद, और स्वतंत्रता की विकृत समझ के रूप में देखा जाता है, जो बाहरी बंधनों से मुक्त होने के रूप में परिभाषित की जाती है। यह झूठा साम्राज्य, जो अहंकार का सामूहिक विस्तार है, सुसमाचार को दबाने की ज़रुरत महसूस करता है, क्योंकि वह जानता है कि यदि ऐसा नहीं हुआ, तो उसका अंत निश्चित है। इसीलिए येशु के अनुयायियों का सताव किया जाता है।
जब हमें इतनी शत्रुता, क्रोध और विद्वेष का सामना करने केलिए मजबूर किया जाता है, तब हमारी सोच इस तरह हो जाती हैं: “मैं गिरजाघर जाता हूं, नियमों का पालन करता हूं; फिर मुझे प्यार और प्रशंसा क्यों नहीं मिलती? यह नकारात्मक प्रतिक्रिया क्यों हो रही है?” हम मन में यह विचार ला सकते हैं कि सत्य को थोड़ा नरम तरीके से प्रस्तुत करना बेहतर होगा। आखिरकार, मैं खुद को और अपने प्रियजनों को इस तरह की कठिनाई में क्यों डालूं? हम सोच सकते हैं, क्यों न हम ‘वश में किया गया मसीही धर्म’’ या ‘हल्का कैथलिक धर्म’ को अपना लें, जिसमें हम अपने स्थानीय समाज की प्रचलित चेतना के साथ तालमेल बिठाते हुए इसके धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को अपना लें और उनका समर्थन करें।
लेकिन यदि हम अपनी संस्कृति की मूर्तिपूजक प्रथाओं की निंदा नहीं करते — जैसे अमीरों द्वारा गरीबों का शोषण, नस्लवाद का जहर, और सांसारिक सत्ता का उपयोग करनेवाले लोगों की झूठ और कपट — तो क्या हम इस कायरता के साथ जी सकते हैं? क्या हम अपने बपतिस्मा की प्रतिज्ञाओं के प्रति सच्चे रह सकते हैं, जिसमें हमें पुरोहित, नबी, और राजा के रूप में अभिषेक किया गया था? मसीह के शरीर के सदस्य के रूप में, हममें से प्रत्येक को अपने शब्दों और कार्यों के द्वारा सुसमाचार के मूल्यों की गवाही देने के लिए बुलाया गया है। और इसका अर्थ यह हो सकता है कि कभी-कभी हमें अपने परिवारों, अपने कार्यस्थलों और व्यापक समाज में एक ‘विरोधाभास का चिन्ह’ बनना पड़ेगा।
एकमात्र मार्ग
यदि हम सामान रूपी हलके, सुरक्षित और आराम की ज़िन्दगी जी रहे कैथलिक बन जाते हैं, तो हम वही बन जाएंगे जिनका वर्णन टी.एस. इलियट ने किया है: ” जीवित लेकिन आंशिक रूप से जीवित।” हमारे पास दो विकल्प हैं: या तो एक आत्मकेंद्रित और स्वार्थी जीवन जीयें, या येशु के मार्ग को अपनाएं, जिसमें येशु केंद्र बिंदु हैं, हमारा जीवन उनके लिए है, और नियंत्रण उन्हीं के हाथों में है। हम एक ही समय दोनों रास्तों पर नहीं चल सकते। जैसा कि हमारे प्रभु स्पष्ट रूप से कहते हैं: ” जो मेरे साथ नहीं है, वह मेरा विरोधी है; और जो मेरे साथ नहीं बटोरता, वह बिखेरता है|” (मत्ती 12:30)
जिस प्रकार एक बीज जड़ों को विकसित करके सूर्य की प्रचंड गर्मी का सामना करता है, उसी प्रकार हमें भी विश्वास की गहराइयों को जानने और थामे रहने की आवश्यकता है। यह केवल गहरी और स्थायी प्रार्थना जीवन, दैनिक रूप से धर्मग्रन्थ और परंपराओं पर चिंतन, संस्कारों में सक्रिय भागीदारी – विशेष रूप से पाप स्वीकार और पवित्र यूखरिस्त – और दूसरों की सेवा — खासकर उनकी सेवा जो सबसे कमजोर हैं — इसके माध्यम से ही हम अपनी आस्था के जीवन को विकसित कर सकते हैं
विश्वास की इन गहरी वास्तविकताएँ हमेशा इस बात को समझने में निहित है कि हम वास्तव में कौन हैं — अर्थात, हम ईश्वर के प्रिय पुत्र पुत्रियां, जिन्हें त्रिएक ईश्वर के साथ एकता में और अपने भाइयों और बहनों के साथ एकजुटता में रहने के लिए बनाये गए हैं। जो लोग अपनी अपनी आत्मा से जुड़े हुए हैं और जिन्होंने खुद को ईश्वर के प्रेम की ऊर्जा में स्थिर किया है, केवल वही लोग येशु का अनुसरण करने के परिणामों को स्वीकार कर पायेंगे। केवल वे ही सताव का सामना करने में साहस और दृढ़ता दिखा पाएंगे।
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डीकन जिम मैकफैडन कैलिफोर्निया के फोल्सम में स्थित सेंट जॉन द बैपटिस्ट कैथलिक चर्च में सेवा देते हैं। वे प्रौढ़ विश्वास निर्माण, बपतिस्मा की तैयारी के लिए प्रशिक्षण, आध्यात्मिक निर्देशन, और कारावास सेवा में कार्यरत हैं।
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जब से मैं बोलना सीखी, माँ ने हल्के तरीके से शिकायत की कि मैं बहुत बकबक करती हूँ। इस केलिए उन्होंने जो किया, उससे मेरी ज़िंदगी बदल गई!
मेरी माँ मुझसे कहती थीं, “तुममें निश्चित रूप से बातूनीपन की कला है।” जब उन्हें लगता था कि मेरा मूड बहुत ज़्यादा बातूनी हो रहा है, तो वे इस छोटी सी कविता का संस्करण सुनाती थीं:
वे मुझे छोटी बातूनी कहते हैं, लेकिन मेरा नाम छोटी मेय है। मैं इतनी बातें इसलिए करती हूँ क्योंकि मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ है। ओह, मेरे बहुत सारे दोस्त हैं, आप देख ही सकते हैं कि कितने सारे हैं, और मैं उनमें से हर एक से प्यार करती हूँ और हर कोई मुझसे प्यार करता है। लेकिन मैं सबसे ज़्यादा ईश्वर से प्यार करती हूँ। वह मुझे रात भर संभाल कर रखता है और जब सुबह होती है, तो वह अपनी रोशनी से मुझे जगाता है।
पीछे मुड़कर देखने पर, लगता है कि शायद उस छोटी सी कविता का उद्देश्य बात करते रहने के बदले और बातों को सोचने के लिए मुझे मजबूर करने और माँ के कानों को कुछ समय के लिए राहत देने केलिए था। हालाँकि, जब माँ वह मधुर लयबद्ध कविता सुना रही थी, तो उस कविता का अर्थ मुझे बहुत सी बातें सोचने के लिए मजबूर करता था।
जैसे-जैसे समय ने मुझे परिपक्वता के पाठ पढ़ाए, यह स्पष्ट हो गया कि मेरे दिमाग में घूम रहे कई विचारों या राय को फ़िल्टर करने या शांत किये जाने की ज़रुरत है, सिर्फ़ इसलिए कि उन्हें दूसरों को सुनाना ज़रूरी नहीं था। स्वाभाविक रूप से मन में आने वाली बातों को दबाने की आदत डालने के लिए बहुत अभ्यास, आत्म-अनुशासन और धैर्य की ज़रूरत थी। हालाँकि, अभी भी ऐसे क्षण थे जब कुछ बातें ज़ोर से कहने की ज़रूरत थी, नहीं तो निश्चित रूप से मैं फटने वाली थी! सौभाग्य से, मेरी माँ और कैथलिक शिक्षा ने मुझे प्रार्थना से परिचित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुझे बताया गया कि जिस तरह मैं अपने सबसे अच्छे दोस्त से बात करती हूँ, बस वैसे ही ईश्वर से बात करना ही प्रार्थना है। इसके अलावा, जब मुझे बताया गया कि ईश्वर हमेशा मेरे साथ है और कभी भी और कहीं भी मुझे सुनने के लिए बहुत उत्सुक है, तो मुझे बहुत खुशी हुई!
सुनने की सीख
परिपक्वता के साथ-साथ यह एहसास भी हुआ कि ईश्वर जो मेरे मित्र है , उस मित्र के साथ एक गहरा रिश्ता विकसित करने का समय आ गया है। सच्चे मित्र एक-दूसरे से संवाद करते हैं, इसलिए मुझे एहसास हुआ कि मुझे ही सारी बातें नहीं करनी चाहिए। उपदेशक 3:1 ने मुझे याद दिलाया: “पृथ्वी पर हर बात का अपना वक्त और हर काम का अपना समय होता है|” और समय आ गया कि मैं ईश्वर को कुछ बातें करने का अवसर दूँ और मैं उसे सुनती रहूँ। इस नई परिपक्वता को विकसित करने के लिए अभ्यास, आत्म-अनुशासन और धैर्य की भी आवश्यकता थी। गिरजाघर या आराधनालय में नियमित रूप से प्रभु से मिलने के लिए समय निकालने से इस रिश्ते की बढ़ोत्तरी में सहायता मिली। वहाँ मैं अपने विचारों को भटकने के लिए प्रेरित कर रहे उन विकर्षणों से मुक्त महसूस करती थी। पहले तो चुपचाप बैठना असहज था, लेकिन मैं बैठ गयी और प्रतीक्षा करने लगी। मैं अपने मित्र प्रभु के घर में थी। वह मेजबान था। मैं मेहमान थी। इसलिए, मेज़बान को सम्मान देते हुए उसके नेतृत्व का पालन करना उचित लगा। कई मुलाकातें मौन में ही बिताई गईं।
फिर एक दिन, मौन के बीच, मैंने अपने दिल में एक कोमल फुसफुसाहट सुनी। यह फुसफुसाहट मेरे सिर या कानों में नहीं थी… यह मेरे दिल में थी। उसकी कोमल लेकिन सीधी फुसफुसाहट ने मेरे दिल को प्यार भरी गर्मजोशी से भर दिया। एक रहस्योद्घाटन ने मुझे जकड़ लिया: वह आवाज़… किसी तरह, मैं उस आवाज़ को जानती थी। यह बहुत जानी-पहचानी थी। मेरा ईश्वर, मेरा दोस्त, वहाँ था। यह एक ऐसी आवाज़ थी जिसे मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी सुनी थी, लेकिन मुझे एहसास हुआ कि मैंने कितनी बार भोलेपन से इसे अपने ही विचारों और शब्दों से दबा दिया था।
समय के पास सच्चाई को उजागर करने का एक अपना तरीका होता है। मुझे कभी एहसास नहीं हुआ कि ईश्वर हमेशा मेरा ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहा था और वह मेरे लिए महत्वपूर्ण बातें कह रहा था। एक बार जब मैंने समझ लिया, तो चुप बैठना अब असंभव और असहज नहीं था। वास्तव में, यह उसकी कोमल आवाज़ सुनने की लालसा और प्रत्याशा का समय था, उसे फिर से मेरे दिल में प्यार से फुसफुसाते हुए सुनने का समय था। समय ने हमारे रिश्ते को इतना मजबूत कर दिया कि अब सिर्फ़ एक या दूसरा व्यक्ति अकेले ही बात नहीं करता था; हम संवाद करने लगे। मेरी हर सुबह, प्रार्थना से शुरू होती थी और मैं उन्हें आने वाले दिन के बारे में बताती थी। फिर, रास्ते में, मैं रुक जाती और उन्हें बताती कि दिन कैसा चल रहा है। जब मैं अपने दैनिक जीवन में उसकी इच्छा को समझने की कोशिश करती तो वह मुझे सांत्वना देता, सलाह देता, प्रोत्साहित करता और कभी-कभी डांटता भी था। उसकी इच्छा को समझने की कोशिश मुझे पवित्र बाइबिल की ओर ले गई, जहाँ एक बार फिर, उसने मेरे दिल में फुसफुसाया। यह महसूस करना मज़ेदार और अद्भुत था कि वह भी काफी बातूनी है, लेकिन मुझे आश्चर्य क्यों होना चाहिए? आखिरकार, उसने मुझे उत्पत्ति 1:27 में बताया कि मैं उसके प्रतिरूप और उसके सादृश्य में बनायी गयी थी!
स्वयं को शांत करने की सीख
समय स्थिर नहीं रहता। इसे ईश्वर ने बनाया है और यह हमें ईश्वर का उपहार है। शुक्र है कि मैं लंबे समय से ईश्वर के साथ चल रही हूं, और हमारी सैर और बातचीत के माध्यम से, मैं समझ गयी हूं कि वह उन लोगों से फुसफुसाता है जो उसे सुनने के लिए खुद को शांत करता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने एलियाह से किया था। “प्रभु के आगे आगे एक प्रचंड आंधी चली – पहाड़ फट गए और चट्टानें टूट गयी, किन्तु प्रभु आंधी में नहीं था। आंधी के बाद, भूकंप आया, किन्तु प्रभु भूकंप में नहीं था। भूकंप के बाद अग्नि दिखाई पडी, लेकिन प्रभु अग्नि में नहीं था। अग्नि के बाद मंद समीर की सरसराहट सुनाई पडी।” (1 राजा 19: 11-12)
वास्तव में, ईश्वर हमें खुद को शांत कराने का निर्देश देता है ताकि हम उसे जान सकें। मेरे पसंदीदा बाइबिल वाक्यों में से एक स्तोत्र 46:1१ है, जहाँ ईश्वर मुझे स्पष्ट रूप से कहता है “शांत हो और जान लो कि मैं ही ईश्वर हूँ।” केवल अपने मन और शरीर को शांत करके ही मेरा दिल उसे सुनने के लिए पर्याप्त शांत हो सकता है। जब हम उसके वचन को सुनते हैं तो वह स्वयं को प्रकट करता है क्योंकि “सुनने से विश्वास उत्पन्न होता है, और जो सुना जाता है, वह मसीह का वचन है।” (रोमी 10:17)
बहुत समय पहले, जब मेरी माँ ने बचपन की वह कविता सुनाई थी, तो उन्हें शायद ही पता था कि मेरे दिल में एक बीज बोया जाएगा। प्रार्थना में ईश्वर के साथ मेरी बातचीत के माध्यम से, वह छोटा सा बीज बढ़ता गया और आखिरकार, मैं ‘सबसे ज़्यादा ईश्वर से प्यार करती हूँ!’ वह मुझे रात भर, खास तौर पर जीवन के अंधेरे दौर में सहारा देता है। इसके अलावा, जब उसने मेरे उद्धार के बारे में बात की तो मेरी आत्मा जाग उठी। इस प्रकार, वह हमेशा मुझे अपने प्रकाश से जगाता है। धन्यवाद, मेरी प्यारी माँ!
प्रिय दोस्त, अब समय आ गया है कि आपको याद दिलाया जाए कि ईश्वर आपसे प्यार करता है! मेरी तरह, आप भी ईश्वर के प्रतिरूप और सादृश्य में बनाए गए हैं। वह आपके दिल में फुसफुसाना चाहता है, लेकिन इसके लिए, शांत रहें और उसे ईश्वर ही मानें। मैं आपको आमंत्रित करती हूँ, यही आपके लिए उचित समय और अवसर है ताकि आप खुद को ईश्वर के साथ गहरा रिश्ता विकसित कर लें। प्रार्थना में उससे अपने सबसे प्यारे दोस्त के रूप में बात करें और उसके साथ अपना खुद का संवाद विकसित करें। जब आप सुनेंगे, तो आपको यह समझने में देर नहीं लगेगी कि जब वह आपके दिल में फुसफुसाता है, तो वह भी ‘बातूनी’ है।
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तेरेसा एन वीडर वर्षों से विभिन्न सेवकाइयों में अपनी सक्रिय भागीदारी के माध्यम से कलिस्या की उल्लेखनीय सेवा करती हैं। वे अपने परिवार के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलिफ़ोर्निया के फॉल्सम में रहती हैं।

मैं अपने बच्चों को आस्था के बारे में सब कुछ सिखाने में इतनी व्यस्त थी कि मैं इस अभिन्न पाठ को भूल गयी…
“रुकिए! पवित्र जल की आशीष मत भूलना!” मेरे छह साल के बच्चे ने निर्णय लिया था कि वह सोने के पहले की प्रार्थना स्वयं करने के लिए तैयार है। पवित्र जल की बोतल को खूब हिलाते हुए – मानो जल की ‘पवित्रता’ नीचे तक डूब गया हो – उसने हम पर जल छिड़ककर हमें आशीर्वाद दिया और जोर से प्रार्थना करने लगा: “हे परमेश्वर, हम तुझसे प्यार करते हैं। तू अच्छा है। तू हमें प्यार करता है। तू बुरे लोगों से भी प्यार करता है। हम तुझे धन्यवाद देते हैं, हे परमेश्वर। आमेन।” मेरी स्तब्ध चुप्पी से कमरा भर गया। इस सरल प्रार्थना ने मेरे दिल को गहराई से छू लिया। मेरे बेटे ने मुझे अभी-अभी दिखाया था कि प्रार्थना को किस तरह परमेश्वर के बच्चे की सादगी के साथ करनी है।
एक अभिभावक के रूप में, कभी-कभी मेरे लिए अपनी ‘वयस्क’ मानसिकता से बाहर निकलना कठिन होता है। मैं अपने बच्चों को अच्छी आदतें बनाने और विश्वास में बढ़ने में मदद करने की कोशिश में बहुत सारी ऊर्जा खर्च करती हूं, लेकिन अक्सर मैं यह भूल जाती हूं कि मेरे बच्चे मुझे येशु से प्यार करने के बारे में क्या सिखाते हैं। जब मेरे बेटे ने साहस जुटाया और जोर से प्रार्थना की, तो उसने मुझे याद दिलाया कि मसीह के साथ मेरे दैनिक संबंध में सरल, सहज प्रार्थना महत्वपूर्ण है। उसने मुझे सिखाया कि अनिश्चित या अनाड़ी महसूस करने के बावजूद, मेरी प्रार्थनाएँ अभी भी प्रभु को प्रसन्न करती हैं।
एक वास्तविक चुनौती
वयस्कों के रूप में, पारिवारिक जीवन, काम का शेड्यूल और काम की ज़िम्मेदारियों की बढ़ती जटिलताएँ अक्सर हमें परेशान करती हैं और परमेश्वर के साथ बात करना मुश्किल बना देती हैं। कलकत्ता की संत तेरेसा ने इस वास्तविक चुनौती को समझा और अपनी मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी बहनों को कुछ सलाह दी: “आप लोग प्रार्थना कैसे करती हैं? आपको एक छोटे बच्चे की तरह परमेश्वर के पास जाना चाहिए। एक बच्चे को अपने छोटे मन को शब्दों में व्यक्त करने में कोई कठिनाई नहीं होती है, लेकिन वे बहुत कुछ व्यक्त करते हैं… छोटे बच्चे की तरह बनें। येशु ने स्वयं हमें बच्चों से सीखने का महत्व दिखाया: “उसने एक छोटे बच्चे को अपने पास बुलाया और बच्चे को उनके बीच रख दिया। और उसने कहा: ‘मैं तुमसे सच कहता हूं, जब तक तुम नहीं बदलोगे और छोटे बच्चों की तरह नहीं बनोगे, तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश नहीं करोगे। इसलिए, जो कोई इस बच्चे की तरह नीचा स्थान लेता है वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है।” (मैथ्यू 18:2-4)
आप और मैं एक बच्चे की तरह प्रार्थना करने की सीख कैसे प्राप्त कर सकते हैं? सबसे पहले, ईश्वर से साहस और विनम्रता मांगें, और पवित्र आत्मा को आपका मार्गदर्शन करने के लिए आमंत्रित करें। इसके बाद, शोर और प्रौद्योगिकी से दूर एक शांत जगह ढूंढें। अपनी प्रार्थना क्रूस के चिन्ह और ईश्वर को आप किस नाम से संबोधित करना चाहते हैं, उसी के साथ शुरू करें। मैंने आपसी बातचीत में पाया है कि किसी का नाम इस्तेमाल करने से रिश्ता गहरा होता है. (येशु के लिए इब्रानी नाम – येशुआ – का अर्थ है ‘प्रभु मुक्ति है’ इसलिए यदि आप निश्चित नहीं हैं कि कौन सा नाम उपयोग करना है, तो सरल नाम चुनें। “येशु” चलेगा)
एक सीधी रेखा सुरक्षित करना
अब, प्रभु से बात करने का समय आ गया है। ज़ोर से, सहजता से प्रार्थना करें, और जो कुछ भी आपके मन में आए, इश्वर को बताएं – यहां तक कि अगर आप परेशान या विचलित महसूस करते हैं तो भी उसे बताएं। क्या आप अभी भी अनिश्चित है कि कहां से शुरू करें? किसी चीज़ के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें, आपका हृदय बदलने के लिए उससे कहें और किसी का नाम लेकर उस व्यक्ति के लिए प्रार्थना करें। अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें और अपने प्रति धैर्य रखें। बच्चों जैसी प्रार्थना की सरलता की खोज करने की आपकी इच्छा ईश्वर को बहुत प्रसन्न करती है। ईश्वर अपने बच्चों से प्रसन्न होते हैं!
इसलिए, अपने बच्चों से सीखने के निमंत्रण को स्वीकार करें। साथ मिलकर आप मसीह के साथ एक गहरे रिश्ते में प्रवेश करना सीखेंगे। जब आप प्रभु से बात करना सीखते हैं तो साहस और विनम्रता के लिए प्रार्थना करें। अपने उद्देश्य के साथ जागरूक रहें, और आप ईश्वर के बच्चे के रूप में प्रार्थना करने की खुशी और सरलता को प्राप्त करेंगे !
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जोडी वीज़ पत्नी, माँ और शिक्षिका हैं जो अपने परिवार के साथ यू.एस.ए. के मिडवेस्ट में रहती हैं। वह 10 वर्षों से अधिक समय से आध्यात्मिक निदेशिका हैं।

सबसे महान प्रचारक, बेशक, येशु स्वयं हैं, और एम्माऊस के रास्ते पर शिष्यों के बारे में लूकस के शानदार वर्णन से बेहतर येशु की सुसमाचार प्रचार तकनीक की कोई और वर्णन नहीं है।
गलत रास्ते पर दो लोगों के जाने के वर्णन से कहानी शुरू होती है। लूकस के सुसमाचार में, यरूशलेम आध्यात्मिक गुरुत्वाकर्षण का केंद्र है – अंतिम भोज, क्रूस पर मृत्यु, पुनरुत्थान और पवित्र आत्मा के उतर आने का स्थान यही है। यह वह आवेशित स्थान है जहाँ उद्धार की पूरी योजना का पर्दाफाश होता है। इसलिए राजधानी से दूर जाने के कारण, येशु के ये दो पूर्व शिष्य परम्परा के विपरीत जा रहे हैं।
येशु उनकी यात्रा में शामिल हो जाते हैं – हालाँकि हमें बताया जाता है कि उन्हें पहचानने से शिष्यों को रोका गया है – और येशु उन शिष्यों से पूछते हैं कि वे किस बारे में बात कर रहे हैं। अपने पूरे सेवा कार्य के दौरान, येशु पापियों के साथ जुड़े रहे। यार्दन नदी के कीचड़ भरे पानी में योहन के बपतिस्मा के माध्यम से क्षमा मांगने वालों के साथ येशु कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे; बार-बार, उन्होंने बदनाम लोगों के साथ खाया पिया, और यह वहां के धर्मी लोगों के नज़र में बहुत ही निंदनीय कार्य था; और अपने जीवन के अंत में, उन्हें दो चोरों के बीच सूली पर चढ़ा दिया गया। येशु पाप से घृणा करते थे, लेकिन वे पापियों को पसंद करते थे और लगातार उनकी दुनिया में जाने और उनकी शर्तों पर उनसे जुड़ने के लिए तैयार रहते थे।
और यही पहली महान सुसमाचारीय शिक्षा है। सफल सुसमाचार प्रचारक पापियों के अनुभव से अलग नहीं रहते, उन पर आसानी से दोष नहीं लगाते, उन पर फैसला पारित नहीं करते, उनके लिए प्रार्थना दूर से नहीं करते; इसके विपरीत, वे उनसे इतना प्यार करते हैं कि वे उनके साथ जुड़ जाते हैं और उनके जैसे चलने और उनके अनुभव को महसूस करते हैं।
येशु के जिज्ञासु प्रश्नों से प्रेरित होकर, यात्रियों में से एक, जिसका नाम क्लेओपस था, नाज़रेथ के येशु के बारे में सभी ‘बातें’ बताता है: “वे ईश्वर और समस्त जनता की दृष्टि में कर्म और वचन के शक्तिशाली नबी थे। हमारे महायाजकों और शासकों ने उन्हें प्राणदंड दिलाया और क्रूस पर चढ़ाया। हम तो आशा करते थे कि वही इस्राएल का उद्धार करनेवाले थे। आज सुबह, ऐसी खबरें आईं कि वे मृतकों में से जी उठे हैं।”
क्लेओपस के पास सारे सीधे और स्पष्ट ‘तथ्य’ हैं; येशु के बारे में उसने जो कुछ भी कहा है, उसमें एक भी बात गलत नहीं है। लेकिन उसकी उदासी और यरूशलेम से उसका भागना इस बात की गवाही देता है कि वह पूरी तस्वीर को नहीं देख पा रहा है।
मुझे न्यू यॉर्कर पत्रिका के कार्टून बहुत पसंद हैं, जो बड़ी चतुराई और हास्यास्पद तरीके से बनाए जाते हैं, लेकिन कभी-कभी, कोई ऐसा कार्टून होता है जिसे मैं समझ नहीं पाता। मैं सभी विवरणों को समझ लेता हूँ, मैं मुख्य पात्रों और उनके आस-पास की वस्तुओं को देखता हूँ, मैं कैप्शन को समझ लेता हूँ। फिर भी, मुझे समझ में नहीं आता कि यह हास्य कैसे पैदा करता है। और फिर एक पल आता है जब मुझे समझ में आता है: हालाँकि मैंने कोई और विवरण नहीं देखा है, हालाँकि पहेली का कोई नया टुकड़ा सामने नहीं आया है, लेकिन मैं उस पैटर्न को समझ जाता हूँ जो उन्हें एक सार्थक तरीके से एक साथ जोड़ता है। एक शब्द में, मैं कार्टून को ‘समझ’ जाता हूँ।
क्लेओपस का वर्णन सुनकर, येशु ने कहा: “ओह, निर्बुद्धियो! नबियों ने जो कुछ कहा है, तुम उस पर विश्वास करने में कितने मंदमति हो।” और फिर येशु उनके लिए धर्मग्रन्थ के प्रतिमानों का खुलासा करते हैं, जिन घटनाओं को उन्होंने देखा है, उनका अर्थ बताते हैं।
अपने बारे में कोई नया विवरण बताए बिना, येशु उन्हें रूप, व्यापक योजना और सरंचना, और उसका अर्थ दिखाते हैं – और इस प्रक्रिया के माध्यम से वे उसे ‘समझना’ शुरू करते हैं: उनके दिल उनके भीतर जल रहे हैं। यही दूसरी सुसमाचार शिक्षा है। सफल प्रचारक धर्मग्रन्थ का उपयोग दिव्य प्रतिमानों और विशेषकर उस प्रतिमान को प्रकट करने के लिए करते हैं, जो येशु में देहधारी हुआ है।
इन प्रतिमानों का स्पष्टीकरण किये बिना, मानव जीवन एक अस्तव्यस्तता है, घटनाओं का एक धुंधलापन है, अर्थहीन घटनाओं की एक श्रृंखला है। सुसमाचार का प्रभावी प्रचारक बाइबल का व्यक्ति होता है, क्योंकि पवित्र ग्रन्थ वह साधन है जिसके द्वारा हम येशु मसीह को ‘पाते’ हैं और उसके माध्यम से, हमारे अपने जीवन को भी।
जब वे एम्माउस शहर के पास पहुँचते हैं, तो वे दोनों शिष्य अपने साथ रहने के लिए येशु पर दबाव डालते हैं। येशु उनके साथ बैठते हैं, रोटी उठाते हैं, आशीर्वाद की प्रार्थना बोलते हैं, उसे तोड़ते हैं और उन्हें देते हैं, और उसी क्षण वे येशु को पहचान लेते हैं। हालाँकि, वे पवित्र ग्रन्थ के हवाले से देखना शुरू कर रहे थे, फिर भी वे पूरी तरह से समझ नहीं पाए थे कि वह कौन था। लेकिन यूखरिस्तीय क्षण में, रोटी तोड़ने पर, उनकी आँखें खुल जाती हैं।
येशु मसीह को समझने का अंतिम साधन पवित्रग्रन्थ नहीं बल्कि पवित्र यूखरिस्त है, क्योंकि यूखरिस्त स्वयं मसीह है, जो व्यक्तिगत रूप से और सक्रिय रूप से उसमें मौजूद हैं। यूखरिस्त पास्का रहस्य का मूर्त रूप है, जो अपनी मृत्यु के माध्यम से दुनिया के प्रति येशु का प्रेम, सबसे हताश पापियों को बचाने के लिए पापी और निराश दुनिया की ओर ईश्वर की यात्रा, करुणा के लिए उनका संवेदनशील हृदय है। और यही कारण है कि यूखरिस्त की नज़र के माध्यम से येशु सबसे अधिक पूर्ण और स्पष्ट रूप से हमारी दृष्टि के केंद्र में आते हैं।
और इस प्रकार हम सुसमाचार की तीसरी महान शिक्षा पाते हैं। सफल सुसमाचार प्रचारक यूखरिस्त के व्यक्ति हैं। वे पवित्र मिस्सा की लय की लहरों में बहते रहते हैं; वे यूखरिस्तीय आराधना का अभ्यास करते हैं; जिन्होंने सुसमाचार को स्वीकार किया है, उन लोगों को वे येशु के शरीर और रक्त में भागीदारी के लिए आकर्षित करते हैं। वे जानते हैं कि पापियों को येशु मसीह के पास लाना कभी भी मुख्य रूप से व्यक्तिगत गवाही, या प्रेरणादायक उपदेश, या यहाँ तक कि पवित्रग्रन्थ के व्यापक सरंचना के संपर्क का मामला नहीं होता है। यह मुख्य रूप से यूखरिस्त की टूटी हुई रोटी के माध्यम से ईश्वर के टूटे हुए दिल को देखने का मामला है।
तो सुसमाचार के भावी प्रचारको, वही करो जो येशु ने किया। पापियों के साथ चलो, पवित्र ग्रन्थ खोलो, रोटी तोड़ो।
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क्या आप जीवन में आने वाली सभी परेशानियों से थक चुके हैं? यह सुपर-भोजन शायद वही हो जिसकी आपको ज़रूरत है!
होमर की ओडिसी, हरमन मेलविले की मोबी डिक, जैक केरौक की ऑन द रोड… सभी में कुछ समानता है – मुख्य पात्र अपनी-अपनी जीवन यात्रा के माध्यम से आगे बढ़ रहे हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि हम भी एक यात्रा पर हैं।
विजेता सब कुछ ले जाता है
नबी एलियाह की जीवन यात्रा के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर, वे बाल देवता के नबियों का सामना करते हैं। एलियाह 400 बुतपरस्त नबियों के साथ कार्मेल पर्वत की चोटी पर हैं और उन्हें नबियों के बीच द्वंद्वयुद्ध के लिए चुनौती देते हैं। वे कहते हैं: “तुम अपने देवता का नाम लेकर प्राथना करो और मैं अपने प्रभु का नाम लेकर प्रार्थना करूंगा; जो देवता आग भेज कर उत्तर देगा, वही ईश्वर है” (1 राजा 18:24)। यह एक बड़ा टकराव है, वास्तविक परीक्षा है। यदि आज कल के टीवी चैनल, उन दिनों मौजूद होते, तो कोई कल्पना कर सकता है कि इस द्वंद्वयुद्ध को उन चैनलों पर कैसे प्रचारित किया गया होगा!
बाल के पुरोहित इसमें शामिल हो जाते हैं: वे प्रार्थना करते हैं और उन्माद में नाचते हैं जैसे कि वे किसी क्रोध सभा में हों, इस दौरान वे अपने देवता को अपना काम करने के लिए कहते हैं। लेकिन कुछ नहीं होता। एलियाह उन्हें ताना मारते हैं: “तुम लोग और ज़ोर से पुकारो! वह तो देवता है न? वह किसी सोच विचार में पडा हुआ होगा या किसी काम में लगा हुआ होगा या यात्रा पर होगा। हो सकता है वह सोया हुआ हो, तो उसे जगाना पडेगा।” (1 राजा 18:27) इसलिए, बाल देवता के पुरोहित अपने प्रयासों को बढ़ाते हैं। वे पुकारते हैं, चिल्लाते हैं, तलवारों और भालों से खुद को तब तक काटते हैं जब तक कि वे खून से लथपथ न हो जाते हैं …बेशक, कुछ नहीं होता।
इसके विपरीत, एलियाह ने शांति से परमेश्वर को सिर्फ़ एक बार पुकारा। परमेश्वर बलि को भस्म करने के लिए आग लाता है, यह साबित करते हुए कि केवल यहोवा प्रभु ही सच्चा ईश्वर है। इसके साथ, भीड़ चकित हो जाती है, और सभी लोग दण्डवत होकर चिल्लाते हैं: “प्रभु ही ईश्वर है; प्रभु ही ईश्वर है।” (1 राजा 18:39)। फिर एलियाह भीड़ को आदेश देते हैं कि वे मूर्तिपूजक नबियों को पकड़ लें और उन्हें किशोन नदी तक ले जाएँ, जहाँ वे उनका गला काट देते हैं। सोचिये, विजेता-सब-कुछ ले जाता है!
एक अप्रत्याशित मोड़
खैर, कोई कल्पना कर सकता है कि बुतपरस्त रानी इज़ेबेल खुश नहीं थी, उसके 400 नबियों को अपमानित किया गया था और मार दिया गया था। रानी को अपनी प्रतिष्ठा बचाने और अपने शाही विशेषाधिकारों को बनाए रखने के लिए कुछ करना होगा। अगर बाल देवता बदनाम होता है, तो वह भी बदनाम होगी, इसलिए वह एलियाह के पीछे जो अब भाग रहा है, अपनी गुप्त पुलिस और सेना भेजती है। एलियाह अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा है, और अगर वे उसे पकड़ लेते हैं, तो वे उसे मार देंगे।
हम सुनते हैं कि एलियाह “मरुभूमि में एक दिन का रास्ता तय कर एक झाडी के नीचे बैठ गया और वे यह कहकर मौत लिए प्रार्थाना करने लगा , ‘प्रभु! बहुत हुआ। मुझे उठा ले, क्योंकि मैं अपने पुरखों से अच्छा नहीं हूँ।’” (1 राजा 19:4) उनका जीवन, जो बुतपरस्त नबियों के टकराव के साथ अभी-अभी चरम पर पहुंचा था, अब नीचे गिर गया है। वे निराश, दुखी और इतना हताश है कि वे चाहते हैं कि ईश्वर उनकी जान ले ले—वे मरना चाहते हैं। वे भागते-भागते थक गए हैं।
मृत्यु केलिए नबी की प्रार्थना नहीं सुनी जाती। उनका मिशन अभी पूरा नहीं हुआ है। तब प्रभु का एक स्वर्ग दूत, ईश्वर का एक संदेशवाहक, उनके पास आता है: “अचानक एक स्वर्गदूत ने उन्हें जगाकर कहा: ‘उठिए और खाइए।’ उसने देखा, और उसके सिरहाने पकाई हुई रोटी और पानी की सुराही राखी हुई है। उसने खाया-पिया, और फिर लेट गया। किन्तु प्रभु के दूत ने फिर आकर उसका स्पर्श किया और कहा: ‘उठिए और खाइए, नहीं तो रास्ता आपके लिए बहुत लंबी होगी।'” (1 राजा 19: 5-7)
स्वर्गदूत नबी को होरेब पर्वत की ओर जाने का निर्देश देता है, जो पवित्र पर्वत सिनाई पर्वत का दूसरा नाम है। रहस्यमय भोजन और पेय से पोषित होकर नबी एलियाह चालीस दिनों तक चलने में सक्षम हो जाते हैं; यह एक महत्वपूर्ण संख्या है जो पवित्र ग्रन्थ के सन्दर्भ में पूर्णता को दर्शाता है। जिस प्रकार उनके पूर्वज मूसा ने दर्शन पाए थे, उसी प्रकार नबी एलियाह को एक दर्शन प्राप्त होते हैं। इस प्रकार हमारे पास एक ऐसी कहानी है जो हताशा से शुरू होती है और एक बार फिर से ईश्वर के कार्यों में सक्रिय रूप से शामिल होने वाले नबी के साथ समाप्त होती है।
आधुनिक समय की इज़ेबेल
इज़ेबेल के दलाल शायद हमारा पीछा नहीं करते, लेकिन हमें अपने दैनिक जीवन में बुरे प्रभावों से जूझना पड़ता है, इसलिए हम आसानी से नबी एलियाह के साथ अपनी पहचान कर सकते हैं। हम में से कई लोग, खासकर जो कुछ समय से इस दुनिया में हैं, इस बिंदु पर पहुँच जाते हैं जहाँ जीवन वास्तव में कठिन है। हमारे पास वह ऊर्जा नहीं है जो हमारे पास बचपन में थी, और जीवन के प्रति हमारा उत्साह कम हो गया है। हमें महामारी, नस्लीय कलह, हमारे लोकतंत्र के लिए खतरे और पर्यावरण क्षरण से जूझने से पहले, दिन गुजारने के लिए बस इतना ही कर सकते हैं। जीवन ने हमें वास्तव में मारा है। हम केवल कुछ ही मनोवैज्ञानिक आघातों को झेल सकते हैं। इसके अलावा, हमारी धार्मिक प्रथा बहुत ही परिचित, यहाँ तक कि यांत्रिक हो गई है। कभी-कभी, ऐसा लगता है कि हमने अपनी दिशा या उद्देश्य की भावना खो दी है। हममें से बहुत से लोग नबी एलियाह की तरह बन गए हैं।
जब हम इस तरह से जीवन के निचले पायदान पर पहुँच जाते हैं, तो हमें क्या चाहिए? एलियाह ने भी यही किया था—यात्रा के लिए पोषण और दिशा और उद्देश्य की नई भावना। हम येशु में अपना पोषण पाते हैं, जिसने कहा: “… जीवंत रोटी मैं हूँ … यदि कोई यह रोटी खाएगा, वह सदा जीवित रहेगा।” (योहन 6:51)। दो बातों पर ध्यान दें: येशु, जीवंत रोटी, साधन और साध्य दोनों है। वह न केवल यात्रा के लिए हमारा पोषण है, बल्कि वह गंतव्य भी है।
हम जो भोजन बन जाते हैं
जब हम पवित्र मिस्सा में भाग लेते हैं, तो हम खुद को ईश्वर को एक उपहार के रूप में पेश करते हैं, जिसका प्रतीक रोटी और दाखरस है। बदले में, हम स्वयं मसीह की स्वयं की उपहार देने वाली वास्तविक उपस्थिति प्राप्त करते हैं। जब हम परम प्रसाद का सेवन करते हैं, तो हम रोटी और दाखरस को जीवंत नहीं बनाते हैं, बल्कि, वह पवित्र, स्वर्गीय रोटी हमें जीवंत बनाती है, क्योंकि यह हमें उसमें आत्मसात कर लेती है! जब हम उसका शरीर और रक्त प्राप्त करते हैं, तो हम उसकी आत्मा और दिव्यता प्राप्त कर रहे होते हैं। जब ऐसा होता है, तो हम उसके अस्तित्व में, उसके दिव्य जीवन में खींचे चले जाते हैं। अब हमारे पास येशु की तरह देखने और उसके जैसा जीवन जीने का साधन है – जो कुछ भी हम करते हैं उसे पिता की सेवा के रूप में महत्व देने का यह परम सौभाग्य है।
पवित्र युखरिस्त हमारी यात्रा का अंत भी है। हमें पृथ्वी पर स्वर्ग का स्वाद मिलता है क्योंकि हम ईश्वर के रहस्य में प्रवेश करते हैं। युखरिस्त के माध्यम से, हम स्थान और समय में स्वर्ग का अनुभव करते हैं। हम ईश्वर के साथ, एक-दूसरे के साथ और पूरी सृष्टि के साथ एकता का अनुभव करते हैं। हम स्वयं की पूर्णता का अनुभव करते हैं, और हमारा दिल अभी और हमेशा यही चाहता है!
यदि आप यात्रा के लिए पोषण और साहस चाहते हैं, तो जीवंत रोटी पवित्र युखरिस्त को अपने जीवन का केंद्र बनाएं। यदि आप ईश्वर से पूर्ण रूप से प्रभावित जीवन का आनंद और संतुष्टि चाहते हैं, तो येशु की जीवंत रोटी का उपहार प्राप्त करें।
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जब उस छोटी लड़की ने अपनी गतिशीलता तथा देखने, सुनने, बोलने और छूने की क्षमता खो दी, तो उसे ऐसी कौन सी प्रेरणा मिल रही थी कि वह अपने जीवन को ‘मीठा’ बता रही है?
छोटी बेनेडेटा ने सात साल की उम्र में अपनी डायरी में लिखा: “यह ब्रह्मांड बहुत ही मोहक है! इस में भरपूर जीवन जीना बहुत बढ़िया है।” दुर्भाग्य से, इस अकलमंद और खुशमिजाज़ लड़की को बचपन में पोलियो हो गया, जिससे उसका शरीर अपंग हो गया, लेकिन दुनिया की कोई भी ताकत उसकी जिंदादिली को अपंग नहीं कर सकी!
मुसीबतों के वे दौर
बेनेडेटा बिआंची पोरो का जन्म 1936 में इटली के फोर्ली में हुआ था। किशोरावस्था में, वह सुनने की क्षमता खोने लगी, लेकिन इसके बावजूद, उसने मेडिकल स्कूल में प्रवेश लिया, जहाँ उसने अपने प्रोफेसरों के होठों को पढ़कर मौखिक परीक्षाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। उसे एक मिशनरी डॉक्टर बनने की प्रबल इच्छा थी, लेकिन पाँच साल की मेडिकल ट्रेनिंग के बाद और अपनी डिग्री पूरी करने से सिर्फ़ एक साल पहले, बढ़ती बीमारी के कारण उसे अपनी पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। बेनेडेटा ने स्वयं अपनी बीमारी का निदान ढूंढ लिया कि उसकी बीमारी का नाम न्यूरोफाइब्रोमैटोसिस है। इस क्रूर बीमारी के कई पुनरावृत्तियाँ हैं, और बेनेडेटा के मामले में, इसने उसके शरीर के तंत्रिका केंद्रों पर हमला किया, उन तंत्रिका केंद्रों पर ट्यूमर बना और धीरे-धीरे पूर्ण बहरापन, अंधापन और बाद में यह बीमारी उसके पक्षाघात का कारण बना।
जैसे-जैसे बेनेडेटा की दुनिया सिकुड़ती गई, उसने असाधारण साहस और पवित्रता का प्रदर्शन किया और कई लोग उस के पास उससे सलाह और मध्यस्थता की तलाश में मिलने आए। वह तब संवाद करने में सक्षम थी जब उसकी माँ अपनी अंगुली से उसकी बाईं हथेली में इतालवी भाषा में लिखती थी। उसके शरीर के उन कुछ क्षेत्रों में से एक उसकी बाएँ हथेली थी जो कार्यात्मक थी। उसकी माँ बेनेडेटा की बाईं हथेली पर विभिन्न पत्र, विभिन्न संदेश और धर्मग्रंथों के कुछ हिस्से बड़ी सावधानी से लिखती थी, और बेनेडेटा अपनी आवाज़ धीमी होने के बावजूद मौखिक रूप से फुसफुसाकर उत्तर देती थी।
बेनेडेटा की सबसे करीबी विश्वासपात्रों में से एक मारिया ग्राज़िया ने कहा, “वे दस और पंद्रह के समूहों में आते-जाते थे। दुभाषिए का कार्य कर रही अपनी माँ के सहयोग से, बेनेडेटा हर एक के साथ संवाद करने में सक्षम थी। ऐसा लगता था जैसे वह हमारी अंतरतम आत्माओं को अत्यंत स्पष्टता से पढ़ सकती थी, भले ही वह हमें सुन या देख नहीं सकती थी। मैं उसे हमेशा ईश्वर के वचन को और अपने भाई बहनों को स्वीकार करने के लिए बढाए गए उसके हाथों के साथ तैयार व्यक्ति के रूप में याद रखूँगी।” (बियॉन्ड साइलेंस, लाइफ डायरी लेटर्स ऑफ़ बेनेडेटा बिआंची पोरो)
ऐसा नहीं है कि जो बीमारी बेनेडेटा को एक मेडिकल डॉक्टर बनने की क्षमता से वंचित कर रही थी, उस बीमारी पर उसने पीड़ा या क्रोध का अनुभव नहीं किया था, लेकिन इसे स्वीकार करने में, वह एक अलग तरह की डॉक्टर बन गई, आत्मा की एक प्रकार की सर्जन। वह वास्तव में एक आध्यात्मिक डॉक्टर थी। अंत में, बेनेडेटा जिस प्रकार की चिकित्सक बनना चाहती थी, उससे बड़ी चिकित्सक वह बन गयी। उसका जीवन उसके हाथ की हथेली तक सिकुड़ गया था, यह परम पवित्र संस्कार की रोटी से बड़ी नहीं थी – और फिर भी, एक पवित्र संस्कार की रोटी की तरह, यह उससे कहीं अधिक शक्तिशाली हो गया था जितनी उसने कभी सोचा था उससे बहुत अधिक।
परम पवित्र संस्कार में येशु छिपा हुआ, छोटा, मौन और निर्बल भी है, लेकिन वह हमारे लिए एक सदाबहार दोस्त है। उसी तरह बेनेडेटा के जीवन और परम पवित्र संस्कार में उपस्थित येशु के बीच के संबंध को नज़रअंदाज़ करना असंभव है।
अपने जीवन के अंत में, उसने एक ऐसे युवक को पत्र लिखा जो इसी तरह की बीमारी से पीड़ित था:
“क्योंकि मैं बहरी और अंधी हूँ, इसलिए मेरे लिए चीज़ें जटिल हो गई हैं … फिर भी, मेरे कलवारी में, मुझे आशा की कमी नहीं है। मुझे पता है कि मेरी इस यात्रा के अंत में, येशु मेरा इंतज़ार कर रहे हैं। पहले मेरी कुर्सी पर, और अब मेरे बिस्तर पर जहाँ मैं अब रहती हूँ, मैंने मनुष्यों की तुलना में अधिक ज्ञान पाया है – मैंने पाया है कि ईश्वर मौजूद है, कि वह प्रेम, विश्वास, आनंद, निश्चिन्तता है, युगों के अंत तक … मेरे दिन आसान नहीं हैं। वे कठिन हैं। लेकिन मीठे हैं क्योंकि येशु मेरे साथ हैं, मेरे दु:खों के साथ, और वह मुझे मेरे अकेलेपन में अपनी मिठास और अंधेरे में रोशनी देते हैं। वह मुझ पर मुस्कुराते हैं और मेरे सहयोग को स्वीकार करते हैं।” (डोम एंटोनी मैरी, ओ.एस.बी. द्वारा लिखित आदरणीय बेनेडेटा बियानचो पोरो से)
एक सम्मोहक अनुस्मारक
बेनेडेटा का निधन 23 जनवरी, 1964 को हुआ था। वह 27 वर्ष की थीं। 23 दिसंबर, 1993 को संत पापा जॉन पॉल द्वितीय ने उन्हें सम्मानित किया और 14 सितंबर, 2019 को संत पापा फ्रांसिस ने उन्हें संत घोषित किया।
संतों द्वारा कलीसिया को दिए जाने वाले महान उपहारों में से एक वह तस्वीर है जिसमे सद्गुण स्पष्ट दिखता है, जो अविश्वसनीय रूप से कठिन परिस्थितियों में भी स्पष्ट दिखता है। हमें अपने को मज़बूत करने के लिए संतों के जीवन में ‘खुद को देखने’ की ज़रूरत है।
धन्य बेनेडेटा वास्तव में हमारे समय के लिए पवित्रता का एक आदर्श है। वह एक सम्मोहक अनुस्मारक है कि गंभीर सीमाओं से भरा जीवन भी दुनिया में आशा और मनपरिवर्तन के लिए एक शक्तिशाली उत्प्रेरक हो सकता है और यह भी याद दिलाता है कि प्रभु हर दिल की गहरी इच्छा को जानता है और उसे अक्सर आश्चर्यजनक तरीकों से पूरा करता है।
धन्य बेनेडेटा से प्रार्थना
हे धन्य बेनेडेटा, तेरी दुनिया परम प्रसाद की रोटी जैसी छोटी हो गई। तू गतिहीन, बहरी और अंधी थीं, और फिर भी तू ईश्वर और धन्य माता मरियम के प्रेम की एक शक्तिशाली गवाह थीं। पवित्र संस्कार में येशु छिपे हुए और छोटे भी हैं, मौन, गतिहीन और यहाँ तक कि निर्बल भी हैं – और फिर भी सर्वशक्तिमान हैं, हमेशा हमारे लिए मौजूद हैं। हे बेनेडेटा, कृपया मेरे लिए प्रार्थना कर, कि जिस तरह से येशु मेरा उपयोग करना चाहता है, मैं येशु के साथ सहयोग करूँ, जैसा कि तूने किया। मुझे सर्वशक्तिमान पिता को मेरे छोटेपन और अकेलेपन के माध्यम से भी बोलने की अनुमति देने की कृपा प्रदान की जाए, ताकि ईश्वर की महिमा और आत्माओं का उद्धार हो। आमेन।
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प्रश्न – मेरे कई ईसाई मित्र हर रविवार को “प्रभु भोज” मनाते हैं, और उनका तर्क है कि मसीह की यूखरिस्तीय उपस्थिति केवल सांकेतिक और प्रतीकात्मक है। मैं विश्वास करता हूँ कि मसीह यूखरिस्त में मौजूद हैं, क्या इस सत्य को उन्हें समझाने का कोई तरीका है?
उत्तर – यह कहना वाकई अविश्वसनीय दावा है कि हर मिस्सा बलिदान में, रोटी का एक छोटा टुकड़ा और दाखरस का एक छोटा प्याला स्वयं ईश्वर का मांस और रक्त बन जाते हैं। यह कोई संकेत या प्रतीक नहीं है, बल्कि वास्तव में येशु का शरीर, रक्त, आत्मा और दिव्यता है। हम यह दावा कैसे कर सकते हैं?
ऐसा मानने के तीन कारण हैं।
पहला, येशु मसीह ने खुद ऐसा कहा। योहन के सुसमाचार, अध्याय 6 में, येशु कहते हैं: “मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ – यदि तुम मानव पुत्र का मांस नहीं खाओगे और उसका रक्त नहीं पीओगे, तो तुम्हें जीवन प्राप्त नहीं होगा। जो मेरा मांस खाता और मेरा रक्त पीता है, उसे अनंत जीवन प्राप्त है, और मैं उसे अंतिम दिन पुनर्जीवित करूंगा। क्योंकि मेरा मांस सच्चा भोजन है, और मेरा रक्त सच्चा पेय। जो मेरा मांस खाता और मेरा रक्त पीता है, वह मुझ में निवास करता है और मैं उस में।” जब भी येशु कहते हैं, “मैं तुम लोगों से सच कहता हूँ…”, यह एक संकेत है कि वह जो कहने वाले हैं वह पूरी तरह से अक्षरश: सही है। इसके अलावा, येशु ने यूनानी शब्द “ट्रोगोन” (trogon) का उपयोग किया, जिसका अनुवाद “खाना” होता है—लेकिन वास्तव में इसका अर्थ “चबाना, कुतरना, या दांतों से फाड़ना” होता है। यह एक बहुत ही चित्रात्मक क्रिया है जिसे केवल शाब्दिक रूप से ही प्रकट किया जा सकता है। इसके साथ ही, उनके सुनने वालों की प्रतिक्रिया पर विचार करें; वे चले गए! यूहन्ना 6 में कहा गया है: “इस [शिक्षा] के परिणामस्वरूप, उनके कई शिष्य उनसे अलग हो गए और अब उनके साथ नहीं चलते थे।” क्या येशु उनका पीछा करते हैं और बताते हैं कि उन्होंने उन्हें गलत समझा है? नहीं, वह उन्हें जाने देते हैं—क्योंकि वह इस शिक्षा के बारे में गंभीर थे कि यूखरिस्त वास्तव में उनका मांस और रक्त है!
दूसरा, हम विश्वास करते हैं क्योंकि कलीसिया ने हमेशा अपने शुरुआती दिनों से ही ऐसा सिखाया है। मैंने एक बार एक पुरोहित से पूछा कि जिस विश्वास या धर्मसार को हम हर रविवार को मिस्सा बलिदान में दुहराते हैं, उसमें यूखरिस्त का उल्लेख क्यों नहीं है – और उन्होंने जवाब दिया कि ऐसा इसलिए था क्योंकि कोई भी यूखरिस्त में येशु की वास्तविक उपस्थिति पर बहस नहीं करता था, इसलिए इसे आधिकारिक रूप से परिभाषित करना आवश्यक नहीं था! कलीसिया के कई श्रेष्ठ अगुवाओं ने यूखरिस्त के बारे में लिखा है – उदाहरण के लिए, शहीद संत जस्टिन ने वर्ष 150 ईस्वी के आसपास ये शब्द लिखे: “क्योंकि हम इन्हें साधारण रोटी और साधारण पेय के रूप में प्राप्त नहीं करते हैं; लेकिन हमें सिखाया गया है कि वह भोजन जो उनके वचन की प्रार्थना से धन्य है, और जिससे हमारा रक्त और मांस पोषित होता है, वह उस येशु का मांस और रक्त है जो देहधारी हुआ।” कलीसिया के प्रत्येक श्रेष्ठ पिता इस बात से सहमत है – यूखरिस्त वास्तव में येशु का मांस और रक्त है।
अंत में, कलीसिया के इतिहास में हुए कई यूखरिस्तिक चमत्कारों के माध्यम से हमारा विश्वास मजबूत होता है – 150 से अधिक आधिकारिक रूप से प्रलेखित चमत्कार हैं। शायद सबसे प्रसिद्ध चमत्कार 800 के दशक में इटली के लैंसियानो में हुआ था, जहाँ एक पुरोहित जिसने मसीह की उपस्थिति पर संदेह किया था, यह देखकर हैरान रह गया कि रोटी दृश्यमान मांस बन गया, जबकि दाखरस खून के रूप में दिखाई देने लगा। बाद में वैज्ञानिक परीक्षणों से पता चला कि रोटी एक पुरुष मानव के हृदय का मांस था, और वह टाइप AB रक्त (यहूदी पुरुषों में बहुत आम) ग्रुप था। ह्रदय के मांस को बुरी तरह से पीटा और घायल किया गया था। रक्त पाँच गुच्छों में जम गया था, जो मसीह के पाँच घावों का प्रतीक था, और चमत्कारिक रूप से एक गुच्छे का वजन सभी पाँचों के वजन के बराबर था! वैज्ञानिक यह नहीं समझा सकते हैं कि यह मांस और रक्त बारह सौ वर्षों तक कैसे बना रहा, जो अपने आप में एक अकथनीय चमत्कार है।
लेकिन हम यह कैसे समझा सकते हैं कि यह कैसे होता है? हम दुर्घटनाओं (कुछ कैसा दिखता है, कैसा महकता है, कैसा स्वाद लेता है, आदि) और पदार्थ (वास्तव में कुछ क्या है) के बीच अंतर करते हैं। जब मैं छोटा बच्चा था, मैं अपनी दोस्त के घर पर था, और जब वह कमरे से बाहर निकली, तो मैंने एक प्लेट पर रखी कुकी देखी। देखने में यह स्वादिष्ट लग रही थी, वेनिला की तरह महक रही थी, और इसलिए मैंने एक टुकड़ा खाया…और यह साबुन था! मैं बहुत निराश हुआ, लेकिन इसने मुझे सिखाया कि मेरी इंद्रियाँ हमेशा यह नहीं समझ सकतीं कि कोई चीज़ वास्तव में क्या है।
यूखरिस्त में, रोटी और दाखरस का पदार्थ मसीह के शरीर और रक्त के पदार्थ में बदल जाता है (एक प्रक्रिया जिसे तत्व परिवर्त्तन के रूप में जाना जाता है), जबकि दुर्घटनाएँ (स्वाद, गंध, रूप) वहीँ रह जाती हैं।
यह पहचानने के लिए वास्तव में विश्वास की आवश्यकता है कि येशु वास्तव में मौजूद हैं, क्योंकि इसे हमारी इंद्रियों द्वारा नहीं देखा जा सकता है, न ही यह ऐसा कुछ है जिसे हम अपने तर्क और कारण से समझ सकते हैं। लेकिन अगर येशु मसीह ईश्वर हैं और वे झूठ नहीं बोल सकते हैं, तो मैं यह मानने को तैयार हूँ कि वे कोई संकेत या प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वास्तव में परम पवित्र संस्कार में मौजूद हैं!
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आप जहां कही भी हों और जो कुछ भी करें, आप जीवन में इस महान मिशन के लिए बुलाये गए हैं।
अस्सी के दशक के मध्य में, ऑस्ट्रेलियाई फिल्म निर्देशक पीटर वियर ने विटनेस नामक अपनी पहली सफल अमेरिकी थ्रिलर फिल्म बनाई, जिसमें हैरिसन फोर्ड ने अभिनय किया था। यह फिल्म एक युवा लड़के के विषय में है जो एक अंडरकवर पुलिस अधिकारी की उसके भ्रष्ट सहकर्मियों द्वारा की गयी हत्या को देखता है, और उस युवक को सुरक्षा के लिए आमिश समुदाय में छिपा दिया जाता है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, वह टुकड़ों को एक साथ जोड़कर याद करता है कि क्या हुआ था और फिर, वह हैरिसन फोर्ड द्वारा अभिनीत जॉन बुक नामक किरदार को सब कुछ बताता है (सुसमाचार के प्रतीक पर ध्यान दें)। फिल्म में एक गवाह के चरित्र को दिखाया गया हैं: वह गवाह जो देखता है, याद करता है, और बताता है।
परिवृत्त में वापसी
येशु ने अपने आतंरिक वृत्त के लोगों को दर्शन दिया ताकि उनके पुनरुत्थान की सच्चाई उन लोगों के माध्यम से सभी तक पहुँच सके। उन्होंने अपने शिष्यों के हृदयों को अपनी मृत्यु और पुनरुत्थान के रहस्य के लिए खोला और कहा: “तुम इन बातों के साक्षी हो” (लूकस 24:48)। उन्हें अपनी आँखों से देखने के बाद, प्रेरित इस अविश्वसनीय अनुभव के बारे में चुप नहीं रह सके।
प्रेरितों के लिए जो सत्य है, वह हमारे लिए भी सत्य है, क्योंकि हम कलीसिया के सदस्य हैं, जो मसीह का रहस्यमय शरीर है। येशु ने अपने शिष्यों को आदेश दिया कि “इसलिए तुम लोग जाकर सब राष्ट्रों को शिष्य बनाओ, और उन्हें पिता, और पुत्र, और पवित्र आत्मा के नाम पर बपतिस्मा दो।” (मत्ती 28:19) मिशनरी शिष्यों के रूप में, हम गवाही देते हैं कि येशु जीवित हैं। इस मिशन को उत्साहपूर्वक और लगातार रूप से अपनाने का एकमात्र तरीका यह है कि हम विश्वास की आँखों से देखें कि येशु जी उठे हैं, कि वे जीवित हैं, और हमारे भीतर और हमारे बीच उपस्थित हैं। यही एक गवाह का कार्य है।
उस परिवृत्त में लौटते हुए सोचें, कोई व्यक्ति पुनर्जीवित मसीह को कैसे ‘देख सकता है’? येशु ने हमें निर्देश दिया: “जब तक गेहूँ का दाना मिटटी में गिरकर मर नहीं जाता, तब तक वह अकेला ही रहता है; परन्तु यदि वह मर जाता है, तो बहुत फल देता है।” (योहन 12:23-24) सरल शब्दों में कहें तो, यदि हम वास्तव में येशु को ‘देखना चाहते हैं, यदि हम उसे गहराई से और व्यक्तिगत रूप से जानना चाहते हैं, और यदि हम उसे समझना चाहते हैं, तो हमें गेहूँ के दाने को देखना होगा जो मिट्टी में मर जाता है: दूसरे शब्दों में, हमें क्रूस की ओर देखना होगा।
क्रूस का चिन्ह आत्म-संदर्भ (अहं के नाटक) से मसीह-केंद्रित (ईश्वर के नाटक) होने की ओर एक क्रांतिकारी बदलाव को दर्शाता है। अपने आप में, क्रूस केवल प्रेम, सेवा और बिना किसी शर्त के आत्म-समर्पण को व्यक्त कर सकता है। ईश्वर की स्तुति और महिमा तथा दूसरों की भलाई के लिए स्वयं को बलिदान के रूप में देने के माध्यम से ही हम मसीह को देख सकते हैं और त्रीत्ववादी प्रेम में प्रवेश कर सकते हैं। केवल इसी तरह से हम ‘जीवन के वृक्ष’ पर कलम हो सकते हैं और वास्तव में येशु को ‘देख’ सकते हैं।
येशु स्वयं जीवन हैं। और हम जीवन की तलाश करने के लिए कठोर रूप से तैयार हैं क्योंकि हम ईश्वर की छवि में बने हैं। इसलिए हम येशु की ओर आकर्षित होते हैं – येशु को ‘देखने’ के लिए, उनसे मिलने के लिए, उन्हें जानने के लिए, और उनके साथ प्यार में पड़ने के लिए आकर्षित होते हैं। यही एकमात्र तरीका है जिससे हम पुनर्जीवित मसीह के प्रभावी गवाह बन सकते हैं।
छिपा हुआ बीज
हमें भी सेवा में समर्पित जीवन की गवाही के साथ जवाब देना चाहिए, एक ऐसा जीवन जो येशु के मार्ग के अनुरूप हो, जो दूसरों की भलाई के लिए बलिदानपूर्ण आत्म-समर्पण का जीवन हो, यह याद दिलाते हुए कि प्रभु हमारे पास सेवक के रूप में आए थे। व्यावहारिक रूप से, हम ऐसा क्रांतिकारी जीवन कैसे जी सकते हैं? यीशु ने अपने शिष्यों से कहा: “पवित्र आत्मा तुम पर उतारेगा, और तुम्हें सामर्थ्य प्रदान करेगा; और मेरे साक्षी होगे” (प्रेरित चरित 1:8)। जिस तरह पवित्र आत्मा ने पहले पेन्तेकोस्त के दिन किया था, वैसे ही वह भय से बंधे हमारे दिलों को मुक्त करता है। वह हमारे पिता की इच्छा को पूरा करने के हमारे प्रतिरोध पर विजय प्राप्त करता है, और वह हमें यह गवाही देने के लिए सशक्त बनाता है कि येशु जी उठे हैं, वे जीवित हैं और वे अभी और हमेशा मौजूद हैं!
पवित्र आत्मा यह कैसे करता है? हमारे हृदयों को नवीनीकृत करके, हमारे पापों को क्षमा करके, और हमें सात उपहारों से भरकर जो हमें यीशु के मार्ग पर चलने में सक्षम बनाते हैं।
केवल छिपे हुए बीज के क्रूस के माध्यम से, जो मरने के लिए तैयार है, हम वास्तव में यीशु को ‘देख’ सकते हैं और इसलिए उसकी गवाही दे सकते हैं। केवल मृत्यु और जीवन के इस अंतर्संबंध के माध्यम से ही हम उस प्रेम की खुशी और फलदायीता का अनुभव कर सकते हैं जो जी उठे मसीह के हृदय से बहता है। केवल आत्मा की शक्ति के माध्यम से ही हम उस जीवन की पूर्णता तक पहुँच सकते हैं जो उसने हमें उपहार में दिया है। इसलिए, जैसा कि हम पिन्तेकुस्त मनाते हैं, आइए हम विश्वास के उपहार द्वारा जी उठे प्रभु के गवाह बनने का संकल्प लें और उन लोगों तक खुशी और शांति के पास्का उपहार लाएँ जिनसे हम मिलते हैं। अल्लेलुया!
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मेरी नई हीरो मदर अल्फ्रेड मोस हैं। मुझे एहसास है कि वह कैथलिकों के बीच प्रचलित नाम नहीं हैं, लेकिन उन्हें होना चाहिए। वह मेरे रडार स्क्रीन पर तभी आईं जब मैं विनोना-रोचेस्टर धर्मप्रांत का धर्माध्यक्ष बन गया, जहाँ मदर आल्फ्रेड ने अपना अधिकांश काम किया और वहीँ उनका दफन हुआ है। उनका जीवन उल्लेखनीय साहस, विश्वास, दृढ़ता और विशुद्ध साहस की अद्वितीय कहानी है। विश्वास करें, एक बार जब आप उनके कारनामों के विवरण को समझेंगे, तो आपको कई अन्य साहसी कैथलिक माताओं की याद आएगी, जैसे: कैब्रिनी, टेरेसा, ड्रेक्सेल और एंजेलिका।
मदर आल्फ्रेड का जन्म 1828 में यूरोप के लक्ज़मबर्ग में मारिया कैथरीन मोस के रूप में हुआ था। एक छोटी लड़की के रूप में, वह उत्तरी अमेरिका के मूलवासी लोगों के बीच मिशनरी कार्य करने की संभावना से मोहित हो गई थी। तदनुसार, वह 1851 में अपनी बहन के साथ अमेरिका की नई दुनिया की यात्रा पर निकल पड़ी। सबसे पहले, वह मिल्वौकी में स्कूल सिस्टर्स ऑफ़ नोट्रेडेम में शामिल हुईं, लेकिन फिर ला पोर्टे, इंडियाना में होली क्रॉस सिस्टर्स में स्थानांतरित हो गईं, जो कि नोट्रेडेम विश्वविद्यालय के संस्थापक फादर सोरिन, सी.एस.सी. से जुड़ा एक समूह था। अपने वरिष्ठों के साथ टकराव के बाद (यह इस बहुत ही उत्साही और आत्मविश्वासी महिला के साथ अक्सर होता था) वह जोलियट, इलिनोई चली गईं, जहाँ वह फ्रांसिस्कन बहनों की एक नई मंडली की सुपीरियर बन गईं, और उन्होंने ‘मदर आल्फ्रेड’ नाम अपना लिया। जब शिकागो के बिशप फोले ने उनके समुदाय के वित्त और निर्माण परियोजनाओं में हस्तक्षेप करने की कोशिश की, तो वह मिनेसोटा में सेवा के नए क्षेत्र की तलाश में निकल पड़ीं, जहाँ महान आर्चबिशप आयरलैंड ने उनका स्वागत किया और रोचेस्टर में एक स्कूल स्थापित करने की अनुमति दी।
दक्षिणी मिनेसोटा के उस छोटे से शहर में ईश्वर ने मदर आल्फ्रेड के माध्यम से शक्तिशाली रूप से काम करना शुरू किया। 1883 में, रोचेस्टर में एक भयानक बवंडर आया, जिसमें कई लोग मारे गए और कई अन्य बेघर और बेसहारा हो गए। एक स्थानीय डॉक्टर विलियम वॉरेल मेयो ने आपदा के पीड़ितों की देखभाल का काम संभाला। घायलों की संख्या से परेशान होकर, उन्होंने मदर आल्फ्रेड और उनकी बहनों से मदद मांगी। हालाँकि वे नर्स नहीं बल्कि शिक्षिका थीं और उन्हें चिकित्सा में कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं था, फिर भी उन्होंने इस मिशन को स्वीकार कर लिया। उस आपदा के बाद, मदर ने बड़ी शांति से डॉक्टर मेयो को बताया कि उनका एक सपना है कि रोचेस्टर में एक अस्पताल बनाया जाना चाहिए, न केवल उस स्थानीय समुदाय की सेवा के लिए, बल्कि पूरे विश्व की सेवा के लिए। पूरी तरह से अवास्तविक इस प्रस्ताव से चकित, डॉक्टर मेयो ने मदर से कहा कि ऐसी सुविधा बनाने के लिए उन्हें $40,000 जुटाने की आवश्यकता होगी। उस समय और स्थान के हिसाब से इस रकम को जुटाना किसी साधारण व्यक्ति के बस की बात नहीं थी। उन्होंने डॉक्टर से कहा कि अगर वे धन जुटाने और अस्पताल बनाने में कामयाब हो जाती हैं, तो वे चाहती हैं कि डॉक्टर और उनके दोनों डॉक्टर बेटे इस अस्पताल में काम करें। थोड़े समय के भीतर, मदर ने धन जुटाया और सेंट मैरी अस्पताल की स्थापना हुई। आप पहले ही अनुमान लगा चुके होंगे, यह वह बीज था जिससे शक्तिशाली मेयो क्लिनिक विकसित हुआ। मदर आल्फ्रेड की बहुत पहले की कल्पना के अनुसार यह वास्तव में मेयो क्लिनिक एक नई अस्पताल प्रणाली बनेगी जो पूरी दुनिया की सेवा करेगी। इस निडर साध्वी ने न केवल अपने द्वारा स्थापित अस्पताल के निर्माता, आयोजक और प्रशासक के रूप में अपना काम जारी रखा, बल्कि सत्तर वर्ष की आयु तक, यानी 1899 में अपनी मृत्यु तक, उन्होंने दक्षिणी मिनेसोटा में कई अन्य संस्थानों के लिए भी काम किया।
कुछ हफ़्ते पहले ही, मैंने अपने धर्मप्रांत में पुरोहितों की ज़रूरत के बारे में लिखा था, और मैंने सभी से पुरोहिताई की बुलाहट को बढाने के मिशन का हिस्सा बनने का आग्रह किया था। मदर आल्फ्रेड को ध्यान में रखते हुए, क्या मैं अब महिलाओं के धर्मसंघी जीवन के लिए और अधिक बुलाहटों का आह्वान कर सकता हूँ? किसी तरह महिलाओं की पिछली तीन पीढ़ियों ने धर्म संघी जीवन को अपने विचार के अयोग्य माना है। द्वितीय वेटिकन परिषद के बाद से धर्मसंघी साध्वियों की संख्या में भारी गिरावट आई है। जब इस बारे में पूछा जाता है, तो अधिकांश कैथलिक शायद कहेंगे कि हमारे नारीवादी युग में धर्मसंघी बहन बनना एक व्यवहार्य संभावना नहीं है। मैं कहूंगा कि यह बकवास है! मदर आल्फ्रेड ने बहुत कम उम्र में अपना घर छोड़ दिया, समुद्र पार करके एक विदेशी भूमि पर चली गईं, धर्मसंघी बन गईं, अपनी बुलाहट और मिशन की भावना का पालन किया, तब भी जब इससे उन्हें कई धर्माध्यक्षों सहित शक्तिशाली वरिष्ठों के साथ संघर्ष करना पड़ा, डॉक्टर मेयो को इस धरती का सबसे प्रभावशाली चिकित्सा केंद्र स्थापित करने के लिए प्रेरित किया, और बहनों के एक धर्मसंघी संस्था के विकास का नेतृत्व और अध्यक्षता की। इन साध्वियों ने चिकित्सा और शिक्षण की कई संस्थानों का निर्माण और संचालन किया। मदर आल्फ्रेड असाधारण बुद्धि, प्रेरणा, जुनून, साहस और आविष्कारशीलता वाली महिला थीं। अगर किसी ने उन्हें सुझाव दिया होता कि वे अपने उपहारों के अयोग्य या अपनी गरिमा से नीचे जीवन जी रही हैं, तो मुझे लगता है कि उनके पास जवाब में कुछ चुनिंदा शब्द होंगे। आप एक नारीवादी नायक की तलाश कर रहे हैं? आप शायद ग्लोरिया स्टीनम को चुनेगे; मैं कभी भी मदर आल्फ्रेड को चुनूंगा।
इसलिए, अगर आप किसी ऐसी युवती को जानते हैं जो एक अच्छी धर्मसंघी साध्वी बन सकती है, जो बुद्धिमान, ऊर्जावान, रचनात्मक और जोश से भरी हुई है, तो उसके साथ मदर आल्फ्रेड मोस की कहानी साझा करें। और उसे बताएं कि वह भी मदर की तरह की वीरता की आकांक्षा रख सकती है।
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