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अक्टूबर 27, 2021
मुठभेड़ अक्टूबर 27, 2021

जब मैं पंद्रह साल की थी तब मेरे पिताजी का देहांत हुआ  और मैंने खुद को बड़ी ही निराशाजनक अवस्था में पाया। एक रात जब मैं प्रार्थना कर रही थी, तब मैंने ईश्वर को बड़ी गहराई से पुकारा, क्योंकि मुझे उनकी मदद की ज़रूरत थी। और ईश्वर ने मेरी प्रार्थना का उत्तर दिया। मैंने ईश्वर को एक दर्शन में देखा। पहले तो मैं आश्चर्यचकित रह गई क्योंकि इससे पहले मैंने कभी कोई दैविक दर्शन नही देखा था। येशु ने मेरी प्रार्थना का उत्तर इस दर्शन द्वारा दिया, जिसमे मैंने उन्हें बाहें खोले, कांटों का मुकुट पहने, प्रज्वलित हृदय के साथ देखा। उन्होंने ना कुछ कहा, ना कुछ किया, फिर भी उनकी उपस्थिति ने मुझे बहुत प्रभावित किया। यह पहली बार था जब मैंने येशु को अपने इतना करीब महसूस किया।

अब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूं तब मुझे यह अहसास होता है कि उस दर्शन में मैंने जो कुछ देखा था, वह मेरे ही जीवन को दर्शाता था। कांटो का वह मुकुट उस पीड़ा को दर्शाता था जिससे मैं उस वक्त गुज़र रही थी, और येशु का प्रज्वलित हृदय, ईश्वर का मेरे प्रति महान प्रेम का चिन्ह था। अब जब भी मैं उस दर्शन को याद करती हूं, येशु की खुली बाहों वाली छवि मुझे इस बात का स्मरण कराती हैं कि अंत में सब ठीक हो जाएगा क्योंकि येशु हमेशा मेरे साथ हैं।

क्योंकि मैं एक कैथलिक परिवार में पली बढ़ी थी, इसीलिए मेरे लिए इस विश्वास के साथ जीना आसान था। रोज़ मिस्सा बलिदान में भाग लेना हमारी दिनचर्या का हिस्सा था। लेकिन जब मैं अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए दक्षिणी अफ्रीका गई, तब मुझे ग्रामीण क्षेत्रों में रहना पड़ा जहां रविवार का मिस्सा भी उपलब्ध नही होता था। इस परिस्थिति ने मुझे इस बात का अहसास दिलाया कि मुझे यूखरिस्त की उपस्थिति और परम प्रसाद ग्रहण करने के अवसरों के लिए कितना आभारी होना चाहिए।

जब मैं अंग्रेज़ी पढ़ाने अल्बानिया गई, तब वहां मुझे एक कॉन्वेंट में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, जहां पवित्र संस्कार की आराधना हर रोज़ हुआ करती थी। इस दिनचर्या ने यूखरिस्त की आराधना के प्रति मेरे प्रेम को स्थापित किया और पवित्र यूखरिस्त के प्रति मेरे प्रेम को और भी गहरा किया। आराधना के इन्हीं पलों में मैंने अपना हृदय ईश्वर के लिए खोला और उनसे अपनी सारी भावनाओं को साझा किया।

लोग मुझसे अक्सर यह सवाल करते हैं कि मैं इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकती हूं कि येशु पवित्र यूखरिस्त में उपस्थित है? मैं उनसे कहती हूं कि मैं ईश्वर की उपस्थिति को महसूस कर सकती हूं। ईश्वर की उपस्थिति, उनकी गर्माहट और उनका प्रेम मुझे चारों ओर से घेर लेता है। आराधना मेरे जीवन का एक अहम भाग है, क्योंकि यह मुझे ईश्वर की बातों और उनकी योजनाओं को सुनने का अवसर प्रदान करता है। जितना मैं ईश्वर की बातों को सुनती हूं, उतना मैं, मेरे जीवन के लिए ईश्वर के निर्धारित उद्देश्यों को पहचान पाती हूं।

जब मैं विश्वविद्यालय में थी, तब मैं रियो डि जेनेरियो के कोपाकाबाना समुद्र तट गई। वहां मैंने विश्व युवा दिवस के एक समारोह में भाग लिया, जो कि अपनेआप में एक अद्भुत अनुभव था। वहां चालीस लाख लोगों ने एक साथ सागर तट पर आराधना की। समुद्र की लहरें एक तरफ हो गईं, सूरज की रौशनी हमारे सर पर थी, और जब पवित्र यूखरिस्त को ऊंचा उठाया गया, मैं भावविभोर हो उठी। येशु की महिमा और उनकी अदृश्य उपस्थिति को अनुभव करना अद्भुत था। उस वक्त, वहां जब मैं लाखों लोगों के बीच, सर को झुकाए अपने घुटनों पर थी, मुझे मेरे सर से जीवन भर का बोझ उतरता सा महसूस हुआ, और मैं ईश्वर के और भी करीब आ गई।

बीते कुछ सालों में मेरा येशु से रिश्ता और गहरा हुआ है, और अब मेरा जीवन पवित्र यूखरिस्त के इर्द गिर्द घूमता है। मैंने अपने जीवन की हर परेशानी, हर परीक्षा में यह सीखा है कि येशु हमेशा मेरे साथ हैं। चाहे वह मिस्सा बलिदान हो, आराधना हो, या मेरी रोज़ की व्यक्तिगत प्रार्थना, मुझे हमेशा ईश्वर की अद्भुत, चमत्कारी उपस्थिति को अनुभव करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

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यह लेख उस गवाही पर आधारित है जो रेबेका ब्रैडले ने शालोम वर्ल्ड प्रोग्राम केएडोरनामक कार्यक्रम में दी थी। पूरे एपिसोड को देखने के लिए shalomworld.org/show/adore पर जाएं।

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By: Rebecca Bradley

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